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अनुशासित एसटी या ओबीसी की मशीन

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समाचार- बिलासपुर :-
बैठ जा बैठ गई, घूम जा-झूम जा , निकल जा वापस आ जा कुछ इन्हीं मिलते-जुलते शब्दों से अमीर गरीब पिक्चर का गाना है आज इसे हम छत्तीसगढ़ कांग्रेस सरकार के संदर्भ में क्यों याद कर रहे हैं। कारण बड़ा साफ हैं। सीएम साहब की कैबिनेट में एसटी वर्ग की यही स्थिति है, संगठन में भी यही हाल है। 90 विधानसभा सीट वाली छत्तीसगढ़ जहां पर 29 सीट आदिवासी एक्सप्रेस की है उसके बावजूद ओबीसी वर्ग का इतना कंट्रोल की बगैर मंत्रीमंडल कामकाज समीक्षा के 1 एसटी मंत्री का यंत्र चालित इस्तीफा लेकर निकाल दिया दूसरे को ले लिया संगठन में भी एक को निकाल दिया एक को ले लिया। शायद किसी निर्वाचित सरकार में ऐसा कम ही होता है की 5 साल के सत्ता का समापन सत्र आ जाए और कभी भी मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा ना हुई हो, ना मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ वह तो सामान्य वर्ग वाले कद्दावर नेता कैबिनेट मंत्री टी एस सिंह देव ने एक विभाग छोड़ दिया तो उसी वर्ग के दूसरे मंत्री को दे दिया। ऐसा लगता है कि पूरी सरकार कामकाज के तरीके से नहीं वर्ग जाति समीकरणों से चल रही है क्या प्रेम सिंह साए को उनके प्रदर्शन के कारण निकाला गया या इस कारण निकाला की वे खामोशी से चले जाएंगे। सोचने लायक है कि मोहन मरकाम जी को मंत्री बनाना है तो उन्हीं के वर्ग का मंत्री बलि क्यों दे..... पर यह छत्तीसगढ़ है जनाब यहां पर सत्ताधारी दल में समीक्षा नहीं होती साहेब की मर्जी चलती है। कहते हैं युवा को मौका दे रहे हैं यदि यह सत्य है तो आयु और स्वास्थ्य देखते हुए पंडित रविंद्र चौबे जी की विदाई क्यों नहीं हो सकती उनका तो स्वास्थ्य भी खराब रहता है और विभाग का प्रदर्शन भी काबिले तारीफ नहीं है पर जातिगत राजनीति के चक्कर में सावन वर्ग को नाराज नहीं किया जा सकता सो विदाई नहीं होती, इसी तरह 4 साल के प्रदर्शन के आधार पर कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा का हाल गुणवत्ता नहीं सुधरी पर नंदकुमार पटेल के बेटे युवा मंत्री उमेश पटेल का विभाग बदला जाना न्याय उचित होता पर ओबीसी राजनीति इसकी इजाजत नहीं देता ऐसा नहीं है कि यह रोग केवल कांग्रेस में लगा है। छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी भी इसी रोग से ग्रसित है। नेता प्रतिपक्ष बदलते समय यही हुआ। प्रदेश अध्यक्ष भी ओबीसी वर्ग से ही लिया गया ऐसा लगता है कि अन्य तमाम मापदंड पर जाति वर्ग भारी पड़ता है। इसे आदिवासी वर्ग के संदर्भ में कहा जा सकता है कि स्वीकार करना अनुशासन में रहना गुण अधिक है और जब तक सहा जाता है सहलो इसी का नाम नंद कुमार साय है। इस नाम का उल्लेख हम इसलिए कर रहे हैं कि अजीत जोगी को निपटाने के लिए कोई अन्य जाति वर्ग का नेता नहीं मिला नंदकुमार साय का उपयोग किया गया और यह उपयोग भाजपा ने किया। भाजपा ने जब नंदकुमार साय की उपयोगिता पूर्ण हो गई उनसे जितना सहते बना सहा और अंत में पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आ गए।