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चेतावनी का बजा हुटर कृषि विकास दर ढलान पर
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बिलासपुर, 11 जून 2026।
भारत की अर्थव्यवस्था को जो सेक्टर अभी तक बचाता आया था अब उसने खतरे की चेतावनी दे दी है। सीधे शब्दों में कहें तो, कृषि सेक्टर में हुटर बज गया है और यह लगातार बज रहा है। कृषि सेक्टर की विकास दर 4.3 से घटकर 3.5 पर आ गई है। मौसम वैज्ञानिकों ने अलनिलो की चेतावनी दे दी है। बारिश कम होगी फसल कम होंगे। डीजल की कीमत बढ़ गई है कुल मिलाकर कृषि की तो लग गई। यह भी याद रखें की रासायनिक खाद की उपलब्धता आदि हो गई है। भारत में कृषि सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला सेक्टर है। वैसे भी जीडीपी और गार्रास वैल्यूऐडेड दोनों में कृषि का हिस्सा 20 फ़ीसदी से कम हो गया है। और सेवा क्षेत्र का हिस्सा 54 फ़ीसदी के आसपास है। उर्वरक की उपलब्धता आदि और कीमतें दो गुनी लिहाजा उर्वरक सब्सिडी दोगुनी हो जाएगी। पिछले साल यह सब्सिडी 1.70 लाख करोड थी। इस साल यह सब्सिडी 3.40 लाख करोड हो जाएगी। जो थोड़ी बहुत कमी बची
शेयर बाजार, मुद्राबाजार, मुद्रास्फिती, विदेशी निवेश, व्यापार घाटा एक शब्द में कहे तो सब कुछ मुद्राराक्षस में तब्दील हो गया है। ऐसे में प्रधान सेवक की विदेश यात्राएं तो चलती रहेगी। फिर भी सरकार छुपाने पर आमादा है। जीडीपी के आंकड़े 7.7 फ़ीसदी को वाह वाह किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि देश पर कोई आर्थिक संकट नहीं है जो अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाते हैं उनका मजाक बनाया जा रहा है। जिस दिन भारत सरकार ने जीडीपी के आंकड़े जारी किए उसी दिन आरबीआई ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए विकास दर का अनुमान जारी किया कहा कि जीडीपी 6.6 फ़ीसदी की रफ्तार से बढ़ेंगे। जबकि दूसरी संस्थाएं इनमें कमी का अनुमान लगा रही हैं। और यह कमी 1.1 फ़ीसदी की है। अगर भारत की अर्थव्यवस्था 400 लाख करोड़ की है तो इसमें चार लाख 40000 का उत्पादन कम होगा। यह इतनी बड़ी रकम है कि मुफ्त अनाज बांटने की योजना का बजट साढे तीन लाख करोड़ का है। अर्थात उससे ज्यादा कमी भारत के सकल घरेलू उत्पाद में आएगी।
बिहार का बजट 3.25 लाख करोड़ का है तो इतनी कमी देश के जीडीपी में आ जाएगी। आखिरी तिमाही में विकास दर 7.8 फ़ीसदी रही तो लोग कहने वालों की युद्ध का कोई असर नहीं हुआ। पर यह आधी सच्चाई है पहली तिमाही में विकास दर 8.1 फ़ीसदी थी। और अंतिम तिमाही में 7.8 फ़ीसदी मतलब असर तो हुआ। यह बात भी ध्यान रखें की मार्क क्लीरीगं का माह होता है तो आंकड़े ऊंचे होते हैं। एक तरफ विशेषज्ञों से कहना कि युद्ध का असर नहीं हुआ। दूसरी तरफ हफ्ते में तीन बार पेट्रोल डीजल का रेट बदलना और रेट बदलने का कारण अंतरराष्ट्रीय स्थिति बताना दोगलापन है। जो प्रधान सेवक एंड कंपनी को खूब आता है।


