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अपनों ने ही लूटा, अन्य में कहां दम था

आगरा की तर्ज पर तो छत्तीसगढ़ में भी हुआ है डायोसिस घोटाला

24hnbc.com 
बिलासपुर, 30 अप्रैल 2026। 
आगरा डायोसिस के बिशप विजोय नायक के खिलाफ कोर्ट के निर्देश पर एफआईआर दर्ज होने के बाद आखिरकार उन्हें लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया और अब उनके स्थान पर दिल्ली के बिशप को आगरा की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई। इस पूरे मामले में कोर्ट ने यह पाया कि आगरा डायोसिस का पैसा बिशप गुपचुप तरीके से उड़ीसा कंधमाल ले जा रहे थे। बताया जाता है कि कंधमाल में बिशप की पत्नी का एक बड़ा स्कूल निर्मित हो रहा है। बताया जाता है कि गलत तरीके से भेजी गई रकम 15 करोड़ से ऊपर की है। इसी तरह एक मामला रतलाम से आया है। रतलाम के सत्र न्यायालय ने ऐतिहासिक आदेश पारित करते हुए कहा कि रतलाम स्थित चर्च सीएनआई की भूमि यूसीएनआईटीए यूनाइटेड चर्च ऑफ़ नॉर्दर्न इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन कि नहीं है और यह पूर्णत नजूल शासकीय भूमि है। ऐसे अन्य मामलों में भी बॉम्बे विल्सन जिम खाना, क्रिश्चियन कॉलेज इंदौर, मिशन अस्पताल बिलासपुर, गांस मेमोरियल रायपुर, के मामले में स्पष्ट हुआ है कि यह जमीन यूसीएनआईटीए या सीएनआई कि नहीं है। रतलाम सत्र न्यायालय का आदेश अपील क्रमांक 148/25 पर आया है। आदेश 21 अप्रैल 2026 का है। देशभर में बिखरे हुए इन निर्णय को छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें। 
अपंजीकृत छत्तीसगढ़ डायोसिस के अवैतनिक पदाधिकारी ही छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ़ एजूकेशन पंजीकृत के पदाधिकारी है। अभी हाल ही में एसडीएम रायपुर ने एक विधि शून्य हो चुके आदेश के आधार पर इस संस्था का चुनाव कराया और नितिन लॉरेंस गुट को जीता हुआ घोषित कर दिया। रजिस्टर फर्म सोसाइटी ने चुनाव परिणाम अपने पास बुलाए थे पर आज तारीख तक नहीं भेजे गए। जबकि चुनाव का रिजल्ट आए 35 दिन से ज्यादा हो चुका है। दो तकनीकी बिंदु है, एसडीएम निर्वाचित पदाधिकारी की सूची भेज नहीं रही है। और निर्वाचित पदाधिकारी भी धारा 26 जमा नहीं कर रहे हैं। जब चुनाव परिणाम जमा नहीं होंगे तो धारा 27 के तहत प्रमाणित प्रतिलिपि जारी कैसे होगी। और धारा 27 प्राप्त किए बिना संस्था पदाधिकारी बैंकों से लेनदेन कर रहे हैं। जो कि पूर्णता विधि के प्रावधानों का उल्लंघन है।
इसी मामले में प्रदेश के राजधानी में लागू कमिश्नर प्रणाली पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है। संस्था के इन्हीं पदाधिकारी के खिलाफ रायपुर के सिविल लाइन थाने में 420, 467, 468, 34 आदि धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ और आरोपितों ने अग्रिम जमानत प्राप्त की 2025 में दर्ज एफआईआर में आधा वर्ष बीत जाने के बावजूद चालान पेश नहीं हुआ है। आखिर एक बड़े आर्थिक के घोटाले की जांच में देरी क्यों की जा रही है। 
वर्ष 2025-26 का पूरा शैक्षणिक वर्ष ईसाई शैक्षणिक संस्थाओं के कूप्रबंधन के लिए याद किया जाएगा। पूरे साल स्कूलों में कई बार प्राचार्य प्रभार बदले, अपनी ताकत दिखाने के लिए शैक्षणिक गैर शैक्षणिक कर्मचारियों को निलंबित किया गया। पूरे कर्मचारी का पीएफ जानबूझकर जमा नहीं किया गया इन सब हरकतों से स्कूलों की प्रतिष्ठा को आघात लगा और नए शिक्षा सत्र में एडमिशन कम हो गए। यह सब कुछ इतना सोच समझ कर किया गया कि वर्षों की तपस्या शिक्षा दान खत्म हो जाए और अब इन स्कूलों को उत्तर प्रदेश के एक बोर्ड के हवाले किए जाने का षड्यंत्र किया जा रहा है। भारतीय शिक्षा पद्धति में यह नया बोर्ड पूर्णता एक राजनीतिक दल की गोद में बैठा हुआ है। और इसी विचारधारा का शासन पूरी हिंदी पट्टी पर है। इस तरह अपने सांस्कृतिक श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए दूसरे की लकीर को सत्ता के साथ मेल बनाकर खत्म किया गया है।