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छठवीं लोकसभा के सदस्य एंथोनी मुर्मू कैसे हुए पुलिस गोली चालन के शिकार

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। जल जंगल और जमीन के संघर्ष ने आदिवासियों को जान का बड़ा नुकसान दिया है और यह नुकसान तब और ज्यादा मारक हो जाता है जब जान का नुकसान पुलिस की निकली हुई गोली से हुआ हो। इसे किसी भी सभ्य समाज में स्थान नहीं मिलना चाहिए बोरियों बांजी गोलीकांड भारतीय लोकतंत्र के ऊपर एक बड़ा धब्बा है इस गोलीकांड में ना केवल 14 आदिवासियों की जान गई बल्कि एक सांसद फादर एंथनी मुर्मू भी शहीद हो गए। आज हम झारखंड को एक राज्य के रूप में देखते हैं तो उसके पीछे आदिवासियों का बड़ा संघर्ष छुपा है और समय-समय पर हुए नरसंहार से यह भी समझ आता है कि यहां के आदिवासियों का किस कदर शोषण हुआ और जब कभी भी जिसने भी इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाई उस आवाज को कितनी बेदर्दी के साथ दबाया गया या दबाने की कोशिश की गई। बोरिओ क्षेत्र में पानी और मछली पर ठाकुरों का अधिकार था सरकार उन्हीं को तालाब के ठेके दे देती थी जो जल जंगल जमीन के स्वभाविक भूमि पुत्र है उन्हें उन्हीं के संसाधनों से दूर रखा जा रहा था इतना ही नहीं साहूकारों के द्वारा उनका शोषण भी हो रहा था इन्हीं कारणों से बोरियों से लगा हुआ गांव बांजी में एक तालाब है तत्कालीन प्रशासन ने तालाब का ठेका किया और ठेका एक ठाकुर को मिल गया आदिवासी सरकार के इस कार्य से बेहद नाराज थे और बड़ी संख्या में एकत्र होकर आंदोलन रखते थे क्षेत्र के पूर्व सांसद एंथोनी मुर्मू आदिवासियों के साथ खड़े थे। आदिवासियों के दबाव का परिणाम था कि तालाब के ठेकेदार ने उन्हें आधे हिस्से में काम करने की अनुमति दे दी थी । 18 अप्रैल को इस तालाब में एक आदिवासी की लाश मिली और यहीं से आंदोलन गंभीर मोड़ पर खड़ा हो गया ।19 तारीख को बड़ी संख्या में आदिवासी एकत्र हुए और उनका नेतृत्व पूर्व सांसद मुर्मू कर रहे थे आदिवासी परंपरागत रूप से तीर कमान से लैस थे बातचीत का माहौल बनता उसके पहले ही पुलिस ने गोली चला दी 30 मिनट में 80 चक्र गोली चली और इस कांड में सांसद सहित 14 आदिवासी मारे गए।
आज भी जिस स्थान पर गोली चालन हुआ हर वर्ष 19 अप्रैल के दिन बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी जूटते हैं अपने पूर्वजों को नमन करते हैं और अत्याचार के विरोध में संघर्ष की कसम खाते हैं ऐसा नहीं है कि झारखंड के आदिवासी अब हर सुविधा पा रहे हो लेकिन यह सच है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जितनी भूमिका आम नागरिकों की है उससे ज्यादा आदिवासियों ने आंदोलनों में नागरिक हितों के लिए संघर्ष किया है भारत का लोकतंत्र उन असंख्य आदिवासियों का सदा ऋणी रहेगा जिन्होंने नागरिक अधिकारों के लिए अपनी राजनैतिक चेतना को कभी दबा कर नहीं रखा। 

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