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ऐशले बंगले का न्यायालीन सत्य

शहर में सक्रिय हैं धार्मिक उन्माद फैलाने वाले तत्व

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। नजूल सीट नंबर 4 प्लॉट नंबर 85/3 रकबा 39400 वर्ग फिट जिसे ऐशले बंगले के नाम से जाना जाता है का विवाद इन दिनों आम सूचना के माध्यम से जहां रोज प्रकाशित होता है वही 1 हफ्ते में दो से ज्यादा बार एक पक्ष विवादित स्थल पर दर्जनों लोगों को लेकर विवाद उत्पन्न करने के लिए पहुंचता है । असल में आम सूचना के बीच यह जानना बहुत जरूरी है कि 1971 में प्रारंभ हुए इस विवाद का न्यायालीन पक्ष क्या है । स्वतंत्रता के पश्चात मसीह समाज में संस्थाओं के मध्य क्षेत्र कार्य और संपत्ति के रखरखाव को लेकर कई प्रकरण चले, मध्यप्रदेश में मसीह समाज में जो संगठन सक्रिय रहे उनमें यूसीएमएस, आईसीसीडीसी और सी ऑफ सी के बीच विलय को लेकर अलग-अलग निर्णय हैं। इसी तरह बिशप तथा फादर के अधिकारों को लेकर भी मतान्तर है । इस सब के बावजूद 17/ 9/ 1971 को यूसीएमएस के बिलासपुर प्रतिनिधि ने प्लॉट नंबर 85/3 की संपत्ति से बनवारी लाल पिता श्री नौबत राम को पंजीकृत दस्तावेज से बेच दिया। मुख्तियार एफ सी जोनाथन ने स्वयं को यूसीएमएस का एग्जीक्यूटिव सेक्रेट्री बताते हुए क्रेता को आधिपत्य देने से इनकार कर दिया वादी स्वस्वत की घोषणा के लिए न्यायालय पहुंच गए, काफी दिनों तक यह मामला कोर्ट में लंबित रहा आखिरकार 1992 में कोर्ट ने इस प्रकरण पर निर्णय सुनाया निर्णय से स्पष्ट होता है कि वादी अर्थात बनवारी लाल अग्रवाल यह सिद्ध करने में असफल रहे कि जिस पावर ऑफ अटॉर्नी से उन्होंने संपत्ति क्रय की है वह विधिवत है कोर्ट ने पावर ऑफ अटॉर्नी को विधि शून्य बताया कोर्ट ने अपने आदेश के पृष्ठ क्रमांक 10 ने स्पष्ट कहा है कि यूसीएमएस ने एफ सी जोनाथन को विक्रय करने का कोई अधिकार ही नहीं दिया । कोर्ट ने कहा कि वादी अपना वाद प्रमाणित करने में असफल रहा है। इस दौरान यूसीएमएस के प्रतिनिधि ने अपील की और अपील में उन्होंने उच्चतम न्यायालय के पास एक नई पावर ऑफ अटॉर्नी प्रस्तुत की जो कि 1998 में की गई इस तरह व्यवहार न्यायालय के पास सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दोबारा रिमांड कर दिया । कोर्ट ने दोनों पावर ऑफ अटॉर्नी पर संदेह व्यक्त किया और कहा कि आवेदक संदेह के परे जाकर पावर ऑफ अटॉर्नी को सिद्ध नहीं कर पाया है और कहा कि एफ सी जोनाथन को वादग्रस्त संपत्ति विक्रय का अधिकार प्रमाणित नहीं हो सका । 92 के आदेश के बाद व्यवहार न्यायालय ने इस प्रकरण में डिक्री भी जारी की है अभी तक विधिक तथ्यों से यह पता चलता है कि उक्त निर्णय को उच्च न्यायालय में बनवारी लाल के विधिक उत्तराधिकारी होने चुनौती दी है और मामला लंबित है, जबकि आम सूचनाओं से यह लगता है कि जो बाद भी कोड किए जा रहे हैं वे विभिन्न संस्थाओं के मध्य चल रहे विवाद हैं बनवारी लाल अग्रवाल के विधिक उत्तराधिकारी बिलासपुर नजूल न्यायालय में एक बार नहीं 3 बार नामांतरण का प्रकरण लेकर गए हैं और तीनों बार उनके आवेदन पत्र निरस्त हुए हैं। अंतिम नामांतरण आवेदन पत्र 2019 में निरस्त किया गया है इस तरह ऐसा लगता है कि शहर के शांति व्यवस्था को कुछ तत्व जानबूझकर आम सूचनाओं के माध्यम से क्षति पहुंचाने का सुनियोजित षड्यंत्र कर रहे हैं। 
 

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