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प्रथम किस्त

चर्च संगठनों की संपत्ति पर फिर शुरू हुआ विवाद

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर । बिलासपुर जिले में चर्च की बेशकीमती संपत्तियां निगम सीमा के भीतर और निगम सीमा के बाहर मौजूद हैं । आज भी कुछ संगठन उस पर काबिज होकर और कुछ कब्जे के बाहर रहकर बेचने का स्वांग रचते रहते हैं किंतु वर्तमान इंदु चौक जरहाभाटा ऐशले बंगले का विवाद ऐतिहासिक है । 
 
और कई मामलों में इस विवाद के संदर्भ में न्यायालय द्वारा जो आदेश पारित किए गए वह सिविल विवादों में क्लास रूम में पढ़ाए जाने योग्य हैं। पहले यह जान ले की मिशन की यह संपत्ति नजूल सीट के अंतर्गत है ऐशले बंगला राजस्व की दृष्टि से नजूल सीट नंबर 84 प्लॉट नंबर 85 /3 रकबा लगभग 34081 वर्ग फुट में है जिसकी वर्तमान कीमत लगभग 30 करोड़ से 35 करोड़ के बीच है। बीच शहर में इतनी बड़ी संपत्ति जिले के ही नहीं पूरे राज्य के भू माफिया के आंख में खटकने वाली है यही कारण है कि 1971-72 में क्रय - विक्रय की गई इस संपत्ति पर 2021 में फिर से विवाद शुरू हो गया है। जानकारों के अनुसार और दस्तावेज के अनुसार 1971 में चर्च की संपत्तियों को संभालने वाली संस्था जिसे यूसीएमएस के नाम से जाना जाता है ने मध्यप्रदेश में 5 संपत्तियां विक्रय की जिनमें से बिलासपुर की एकमात्र संपत्ति है जिस पर व्यवहार न्यायालय से लेकर हाई कोर्ट और हाईकोर्ट से लेकर उच्चतम न्यायालय तक विवाद चल रहा है। दस्तावेजों के अनुसार सन 71-72 में एक अस्पताल के निर्माण के लिए रुपयों की आवश्यकता के कारण ऐशले बंगला बेचा गया और उस वक्त के प्रतिष्ठित नागरिक राय साहब बनवारी लाल ने यूसीएमएस से इसे उस वक्त के दर के अनुसार क्रय किया। क्रेता को तब भी यह पता था कि उस स्थान पर एडमिन भागीरथी नाम का व्यक्ति रहता है क्रय करने के पश्चात क्रेता ने सक्षम न्यायालय में बेदखली का वाद दाखिल किया और उसी वक्त दूसरे पक्ष ने स्थाई निषेधाज्ञा के लिए वाद प्रस्तुत किया समय-समय पर पेसी दर पेसी विवाद चलते रहे जैसे-जैसे संपत्तियों का बाजार मूल्य बढ़ना प्रारंभ हुआ दांवपेच भी बदलते गए बिलासपुर में चर्च की संपत्तियों पर एक से अधिक संगठनों के दावे हैं अतः स्वभाविक था कि यूसीएमस के साथ बाद में आईसीडीसी नाम की संस्था भी संपत्ति विवाद में कूद पड़ी व्यवहार न्यायालय के पहले निर्णय में स्पष्ट है कि यूसीएमस अपनी संपत्तियों का विक्रय कर सकती है लिहाजा राय साहब बनवारी लाल के द्वार करें की गई संपत्ति की खरीदी बिक्री कानूनी है किंतु इसी आदेश में कब्जा धारी के हीतों की चर्चा भी की गई यही कारण है कि आवेदक ने इस निर्णय से शुब्ध होकर बड़े न्यायालय में इसे चुनौती दी वर्तमान में तारीख 14 सितंबर को सुशील कुमार अग्रवाल कि एक आम सूचना प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने बताया कि वे राय साहब बनवारी लाल के पौत्र हैं और पैतृक बंटवारे में मिली इस संपत्ति के स्वामी कृष्ण कुमार अग्रवाल से उनका अनुबंध है जबकि कुछ लोग इसे कथा कहानी के आधार पर बेचने का प्रयास कर रहे हैं ।1 दिन बाद ही कृष्ण कुमार अग्रवाल ने सुशील कुमार अग्रवाल के द्वारा प्रकाशित कराई गई आम सूचना का खंडन किया और बताया कि अनुबंध पत्र 24/ 10 /2012, 2/9 /2013, 6/4/2015 विधि शून्य है और उच्चतम न्यायालय में कौन सा वाद लंबित है प्रथम आम सूचना में उपयोग किए गए कुछ शब्दों से धार्मिक संगठनों की गतिविधियां फिर से राज्य के वर्तमान परिपेक्ष में महत्वपूर्ण हो गई है साथ ही लगभग 1 एकड़ के विशाल भूभाग पर कौन असली हकदार है कौन ट्रेस पासर है और कैसे कैसे मूल्यवान संपत्ति पे बाजार रेट को बिगड़ा जाए के प्रयास रोज हो रहे हैं हम संपत्ति के विवाद में यूसीएमएस के पदाधिकारी दिवंगत नत्थू लाल सोनी तथा आईसीडीसी के पदाधिकारी बरडे की भूमिका पर भी पृथक से समाचार बनाएंगे। 

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