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कांग्रेस में भीतरघातियों का है लंबा इतिहास, बिलासपुर में इस बार कैसा रहा इनका काम
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बिलासपुर, 23 नवंबर 2023।
छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के नामांकन पत्र जमा होने के दिन से ही कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी के भीतर असंतुष्टों का एक ऐसा समूह तैयार हो गया था जिसने पार्टी के घोषित प्रत्याशी के खिलाफ काम किया। कुछ स्थानों पर गुपचुप तरीके से तो कहीं पर खुल्लम खुल्ला।
हम यहां पर बिलासपुर जिले की केवल 6 सीट की बात कर रहे हैं। कांग्रेस के जिले में केवल दो प्रत्याशी पूर्व से विधायक का दर्जा रख रहे थे, बिलासपुर और तखतपुर दोनों विधानसभा क्षेत्र में भीतरघात हुआ। तखतपुर के विधायक बेहद साधन संपन्न और दबंग माने जाते हैं। अपनी जुझारू छवि लड़कर हक लेने के लिए पहचान रखते हैं। इसके बावजूद भीतरघातियों से निपटने के लिए हाई कमान के पास शिकायत लेकर गए यह बात समझ के परे है। अखबारों में समाचार लिखे गए की तखतपुर क्षेत्र में प्रदेश कांग्रेस के एक पदाधिकारी अशोक अग्रवाल पर भितरघात का आरोप लगा और उन्हें कारण बताओं नोटिस जारी हुआ।
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले का इतिहास है ये नाम 2003 से विधानसभा चुनाव में कभी भीतरघात तो कभी कांग्रेस से इस्तीफा देकर अन्य राजनीतिक दल से चुनाव में उतर जाना बाद में पार्टी में वापसी कर लेना, इस बात का चिंतन तो कांग्रेस हाईकमान को करना चाहिए कि ऐसा राजनीतिक नाम जो बार-बार पार्टी को नुकसान पहुंचता है की पार्टी में क्या जरूरत है। वे जनबल रखते हैं या पार्टी को उनके धनबल की जरूरत है। आखिर उन्हें पार्टी में पुनः प्रवेश कौन दिलाता है। तखतपुर में कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने भी पार्टी के घोषित प्रत्याशी के खिलाफ काम किया आखिर क्यों ना करें। भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी धरमजीत सिंह कांग्रेस में थे वर्ष 2018 में अजीत जोगी के साथ जुदा राह बनाते हुए दूसरे राजनीतिक दल की नींव रखी और अच्छी खासी ताकत भी इकट्ठी की, उनके अपने ही राजनीतिक दल से उनको निकाल दिया गया। कहा जाता है कि वे जीसीसीजे को भाजपा में मर्ज करने जा रहे थे बात नहीं बनी तो स्वयं भाजपा में शामिल हो गए। बिलासपुर में उनके कांग्रेसी मित्रों की संख्या बहुत बड़ी है ऐसे में राजनीतिक नैतिकता निभाने के स्थान पर मित्र धर्म निभाना उचित जान पड़ा होगा। कांग्रेस तो क्षमा स्थलीय है हारे या जीते माफ कर ही देगी इसलिए पार्टी से बगावत, पार्टी में भीतरघात हिम्मत ज्यादा हो जाती है। भीतरघाती वही नाम है जो 2018 के चुनाव में कांग्रेस भवन के भीतर बिलासपुर विधानसभा के घोषित प्रत्याशी को अभद्र गाली दे रहा था और प्रत्याशी हाथ जोड़कर खड़ा था। तब हाईकमान ने कठोर निर्णय क्यों नहीं लिया। कांग्रेस का इतिहास बताता है और विभाजित मध्य प्रदेश के समय व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण इन्हीं कांग्रेस नेता को कांग्रेस भवन के भीतर मारपीट का सामना करना पड़ा था। तब भी अनुशासन हिनता की कोई बड़ी कार्यवाही नहीं हुई। और सामाजिक तत्वों का जमावड़ा एकत्र करने का परिणाम कांग्रेस को भुगतना पड़ता है। पर कांग्रेस तो साधु है अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकती।
बिलासपुर विधानसभा 2018 के जीते हुए चुनाव में भी खूब भीतरघात हुए और इस बार भी हुए पर प्रत्याशी शैलेश पांडे का बड़प्पन है वे हाईकमान के पास जाकर रोना नहीं रोए उसे कुछ हासिल भी नहीं होता है। ऐसे आधा दर्जन विधायक हैं जिन्होंने कांग्रेसी पार्षद होते हुए कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में काम नहीं किया। इसी कड़ी में पार्टी के फेडरल आर्गेनाइजेशन के कुछ नामचिन भी भीतरघात करते रहे। सेवा दल के एक पुराने ब्राह्मण नेता ने कांग्रेस प्रत्याशी के विरोध में काम किया है उसके बावजूद या पहली बार होगा जब 27 खोली क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी को लीड मिलेगी।
बिल्हा क्षेत्र में भी कांग्रेस के प्रत्याशी सियाराम कौशिक के खिलाफ खूब भीतरघात हुआ है। कहते हैं कि सबसे पहले असंतोष घर से ही शुरू हुआ ऊपर से क्षेत्र में जिसकी ड्यूटी लगाई गई वे उत्तरदायित्व को छोड़कर अपना मित्र धर्म निभाने चले गए। साथ ही यदुनंदन नगर के एक नेता जी ने घोषित प्रत्याशी के पक्ष में काम न किया उलट भाजपा प्रत्याशी को मदद की कहा जाता है कि सार्वजनिक जीवन में इन दोनों के मतभेद उजागर हैं पर चुनाव के दौरान मित्रवत हो जाते हैं।
मस्तूरी क्षेत्र में कांग्रेस के घोषित प्रत्याशी के खिलाफ कोई और नहीं तो प्रदेश उपाध्यक्ष ने मोर्चा खोल लिया ऐसा कभी कभार होता है। और प्रदेश उपाध्यक्ष के खिलाफ कारण बताओं नोटिस और निलंबन हुआ कहते हैं कि निलंबन के बाद तो उनके साथियों के हाथ और खुल गए और उन्होंने जीसीसीजे के प्रत्याशी की खूब मदद की। मस्तूरी जिले का एक ऐसा विधानसभा है जहां पर संगठन ने प्रत्याशी के पक्ष में मजबूती के साथ खड़े होकर काम किया इसलिए भीतरघात का वैसा असर नहीं दिखाई दिया जैसा अन्य स्थान पर...
जिले का सर्वाधिक चर्चित विधानसभा क्षेत्र कोटा जहां पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के दुलारे अटल श्रीवास्तव मैदान में थे। पिछले 5 साल से वे कांग्रेस में एक से ज्यादा भूमिका निभा रहे हैं। वे संगठन में एक बड़े पद पर हैं साथ ही कैबिनेट मंत्री का दर्जा रखते हैं। पर्यटन के कारण पूरे प्रदेश में उनका नेटवर्क है इस तरह उनका आभामंडल बड़ा चमकदार है के बावजूद कोटा में भीतरघात हुआ। जिसके कारण छती भी हुई है कितनी छती हुई 3 दिसंबर को लग जाएगा। कोटा के साथ ही बेलतरा की चर्चा अनिवार्य है। दोनों स्थानों पर भीतरघात के बीच अन्नोन आश्रय संबंध है दोनों स्थानों का भीतरघात परस्पर जुड़ा हुआ है। चुनाव के पहले तक जो मित्र थे वो चुनाव में प्रतिस्पर्धी तो नहीं बने पर अचानक मित्रता की चाशनी में खटास पड़ गई चेले चंटों ने दोनों गुरुओं के बीच खूब भीतरघात की बताई जाती है। बेलतरा में कांग्रेस प्रत्याशी तो जिला ग्रामीण अध्यक्ष के पद पर है पूरा संगठन उसकी जेब में है उसके आदेशों के सामने नतमस्तक है पर बेलतरा में उन्होंने स्वयं अपने संगठन पर भरोसा नहीं जताया और अपनी निजी टीम को ही चुनाव में काम सौंपा। कल की किस्त भाजपा के भीतरघात।


