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अप्रवासी मजदूर बनेंगे बड़ा चुनावी मुद्दा
- By 24hnbc --
- Thursday, 09 Mar, 2023
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समाचार -
बिलासपुर, 10 मार्च 2023। जब कभी भी 2014 से 2024 के 10 वर्षों का लेखा जोखा लिखा जाएगा तब लोगों को यह समझ आएगा कि इन 10 सालों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने लोकतंत्र को कभी ना भरा जा सकने वाला नुकसान पहुंचाया, और वह नुकसान है कि लोकतंत्र का चेक एंड बैलेंस सिस्टम खराब कर दिया गया। खत्म कर दिया गया हाल ही में कानून मंत्री जिस तरह के बयान दे रहे हैं उससे लगता है कि वे देश की सर्वोच्च अदालत को अपने अंगूठे के नीचे नहीं कर पा रहे अन्यथा कुछ माह पूर्व यही सर्वोच्च अदालत वित्त मंत्री के लिए अच्छी थी जब नोटबंदी पर फैसला आया। पेगासस पर फैसला आया, केंद्र की सत्ता को सर्वोच्च अदालत के कुछ फैसले जैसे सेबी, अदानी का मामला, चुनाव आयोग का मामला, पवन खेड़ा का मामला, महाराष्ट्र की ईडी सरकार का मामला गले नहीं उतर रहा है उन्हें चिंता है 370, हिंडनबर्ग, इलेक्ट्रोल बांड के मामले अभी पाइप में है पर सबसे बड़ा जो मामला अभी दिखाई तो दे रहा है पर चर्चा में नहीं है वह है देश के कुछ राज्यों से दूसरे राज्यों में जाकर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों का मामला। यह मामला अप्रवासी मजदूरों से संबंधित होता है और इस समस्या के कारण सांस्कृतिक टकराव की स्थितियां बनती बिगड़ती हैं। भारतीय जनता पार्टी की खाठी राजनीति ने इस अप्रवासी वोटर पर अपनी नजरें लगा दी हैं। वन नेशन वन राशन कार्ड के समय से ही यह सोच बाहर आ चुकी थी तमिलनाडु में जिस तरह से बिहार के और प्रवासी मजदूरों के साथ बगैर किसी घटना के खबर उड़ाई गई वह सोची समझी राजनीति है। असल में इसे घटिया नीति कहा जाता है जिससे केवल चुनाव जीता जा सकता है। और बीजेपी के लिए उसके वर्तमान नेतृत्व के लिए चुनाव जीतना ही सब कुछ है वैसे भी यह पार्टी चुनाव जीतने के बाद कभी भी गवर्नेंस के लिए नहीं जानी जाती वह साल के 365 दिन चुनाव मोड में ही रहते हैं देश में बढ़ रही बेरोजगारों की फौज को भी वे वोट बैंक के रूप में ही देखते हैं क्योंकि यह ठलहा बेरोजगार युवा ही 2 जी बी डाटा खाकर दिनभर भक्ति के सागर में आकंठ डूब कर दिन भर रोल करता है। यूपी में देश के सबसे ज्यादा युवा बेरोजगार पाए जाते हैं। राहुल गांधी ने भारत के बाहर भारत की इसी विडंबना को रखना शुरू किया है। तभी भाजपा की ट्रोल आर्मी परेशान दिखती है। देश में इन दिनों 28.9% माइग्रेशन चल रहा है शहरी क्षेत्र से 35% और ग्रामीण क्षेत्र से 28%। अटल बिहारी वाजपेई के समय 64.16% रोजगार खेती में था और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 10.7% था। मनमोहन सिंह के समय खेती में 58% और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 12.7% अर्थ यह है कि कृषि में रोजगार घटा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 1% की वृद्धि हुई। मोदी कार्यकाल में खेती में रोजगार 48.9 से घटकर 45.5 पर आ गया और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में -1.27% घाटा और 11.6 से घटकर 10 के नीचे चला गया। एक छोटे से विधानसभा क्षेत्र छत्तीसगढ़ के मस्तूरी का उदाहरण ले। कोविड में पलायन वापसी के आंकड़े बताते हैं कि मस्तूरी में 1-2 -10 हजार नहीं 30000 श्रमिकों ने वापसी की थी। इसी तरह बिहार से तमिलनाडु जाने वाले श्रमिक पूरे प्रदेश तमिलनाडु में नहीं जाते वह चुनिंदा 5 जिलों में जाते हैं। किसी राज्य से दूसरे राज्य में जाकर काम करने वाले श्रमिक अपनी स्थानीय राजनीति और जहां पर काम करने जाते हैं वहां की राजनीति में बड़ा प्रभाव डालते हैं। इसी बात को भारतीय जनता पार्टी की ब्रिगेड ने राजनीति का हथियार बनाने की ठान ली है। साथ में महिला वर्ग को भी निशाने पर लिया है तभी तो तमिलनाडु से एक प्रायोजित खबर चली कि बिहारी श्रमिकों को पीटा जा रहा है। ध्यान दें ना तो तमिलनाडु में भाजपा की सकता है और ना ही बिहार में तो ऐसे राज्य जहां पर भाजपा दोनों जगहों पर सत्ता में नहीं है ऐसी मार पिटाई की झूठी खबरें अब कभी भी आएंगी। आने वाले समय में देश के प्रधानमंत्री रोज 5 कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे और यह कार्यक्रम उन राज्यों में रखे जा रहे हैं जहां पर 2023 में चुनाव है। कार्यक्रमों का तरीका इवेंट मैनेजमेंट के आधार पर होगा घोषणाओं की बरसात होगी भले ही गुपचुप दस का चार मिले, सिलेंडर 1200 के पार हो जाए, तेल 140 के ऊपर हो जाए, कपड़े की कीमत में 15% का इजाफा हो जाए। अब तो बाजार का गेहूं, चावल, जीरा, मिर्च, मसाला यानी कि गृहस्ती के सब सामान का दाम एवरेज 15% महंगा है। सब्सिडी समाप्त प्राय है, खेती में दुगनी आए का वादा 0 निकला, काला धन वापस आया नहीं। प्रत्येक नागरिक के खाते में 15 लाख मिला नहीं, पेंशन बंद हो गई, स्थाई नौकरी खत्म हो गई, नौकरी का सर्टिफिकेट नियुक्ति पत्र कितना कीमती हो गया की जब इसे लेने देने की बारी आती है तो देश का प्रधान सेवक स्वयं इसे देने आता है, पहले तो डाकिया लाके दे देता था तब बेरोजगारों को समझना चाहिए की नौकरी वास्तव में कितनी कठिन हो गई है।


