पिछले दरवाजे से मनु स्मृति लागू करने की कोशिश
हिंदू राष्ट्र के नाम पर अगड़ी जातियां फिर करेगी दमन , रहिए तैयार..... निलेश बिसवास
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समाचार -
बिलासपुर, 22 फरवरी 2023। विश्वविद्यालयों में शोध हो अच्छी बात है इनका निर्माण ही शोध के लिए किया गया है। पर सामाजिक ऐतिहासिक विषयों पर शोध के परिणाम जब पहले से ही फीनामिना में पहले से ही तय कर लिए जाएं तब विश्वविद्यालय की शोध क्षमता पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाता है। इसमें किसी विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक संदर्भों का कोई मोल नहीं है, वर्तमान का नेतृत्व और इस देश काल में कुर्सियों पर बैठे गिने-चुने लोगों में यह हिम्मत है कि वह देश के संविधान को पूजे. .... बिलासपुर से लेकर बनारस तक विश्वविद्यालय के कुलपतियों की पहली योग्यता सनातन धर्म के सामने दंडवत लेट कर आगे तक हाथ बढ़ाकर साष्टांग प्रणाम करने की है। आज हमें व्हाट्सएप के माध्यम से एनसीपी के प्रदेश प्रवक्ता ने बनारस काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लेटर हेड पर प्रकाशित फैलोशिप हर महीने 25380 फिक्स पद, मनुस्मृति समाज में लागू करने की स्थितियों पर अध्ययन भेजा। उनका मानना है कि इस तरीके के शोध भारतीय संविधान को सीधे-सीधे चुनौती देना है उन्हें लगता है की इस कालखंड में जब देश की उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में जिन छात्रों ने आत्महत्या की उनमें से 50% एसटी, एससी थे। और आत्महत्या का कारण जाति विभेद था ऐसे में यदि मनु स्मृति सामाजिक जीवन मूल्यों को तय करने वाली किताब बन गई तब शैक्षणिक संस्थाओं में छोड़िए आम जीवन में जातिगत विभेद इतना बढ़ेगा की कल्पना करिए। और एक बार फिर से अंबेडकर द्वारा लिखी किताबों को पढ़िए पता चलेगा मटके में रखा हुआ एक गिलास पानी किसी एससी की पहुंच से कितना दूर होता है।


