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बिलासपुर में कौन बनेगा अनिल टाह समर अभी शेष है

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(शशांक दुबे की कलम से) 
बिलासपुर, 22 जनवरी 2023। 1998 का विधानसभा चुनाव बिलासपुर के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज है भाजपा, कांग्रेस के मुकाबले कोई तीसरा चाहे वह निर्दलीय हो, एनसीपी हो, आप हो या हो बसपा और यदि आपकी जानकारी में दो- चार- दस नाम और याद आते है तो स्वयं लिख ले यह चुनाव किस लिए याद किया जाता है कि निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले अनिल टाह को 30038 मत प्राप्त हुए और जीतने वाले अमर अग्रवाल 40293 मत कांग्रेस का उम्मीदवार तीसरे नंबर पर खिसक गया था। 98 के बाद कांग्रेस को बिलासपुर जीतने के लिए तीन दशक इंतजार करना पड़ा तीसरे से पहला बन्ना कितना कठिन होता है और आज कोई अनिल टाह से पूछे, की सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ निर्दलीय या अन्य कोई पार्टी ज्वाइन करके चुनाव को प्रभावित करना कितना कौशल का काम है पर राजनीति के क्षेत्र में अचानक कुछ चेहरे जाने किसकी एडवाइस पर इन दिनों इठला रहे, इतरा भी रहे। जब अच्छे अच्छे नेता आने वाले खर्च को देखकर जमीनी राजनीति कर रहे हैं तो दो चेहरे बैनर पोस्टर पर रुपए बहा रहे हैं..... । प्रश्न तो उठता ही है कि यह किसके इशारे पर हो रहा है आज बिलासपुर में तीसरा कब महत्वपूर्ण हो जाता है और इस तीसरे को खेलता कौन हैं क्योंकि यह तीसरा कभी चुनाव तो नहीं जीतता कहते हैं। राजनीति में पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा चुनाव हराने के लिए और तीसरा चुनाव जीतने के लिए लड़ा जाता है। और ऐसा होता कम है तीसरी बार लड़ने का माद्दा ही नहीं बचता कोई यूं ही अनिल टाह नहीं हो जाता । वे तो चौथा भी हारे हम बात कर रहे हैं बिलासपुर विधानसभा की कुछ लोगों को लगता है कांग्रेस विधायक शैलेश पांडे की टिकट खतरे में हैं हम ऐसा नहीं मानते उसके राजनीतिक विरोधी चाहे वह कांग्रेस में हो या भाजपा में अंदर से सब यही चाहते हैं कि कांग्रेस की ओर से शैलेश पांडे ही चुनाव में उतरे भले भाजपा से कोई और चेहरा हो जाए। कांग्रेस में ऐसा चाहने वालों की कमी नहीं कि शैलेश पांडे हार जाएं पर नेताओं के चाहने से क्या होता है मतदाता जिसे चाहते हैं वह जीतता है नेता का सबसे बड़ा गुण जनता से मिलना, अच्छा बोलना और हमेशा मिलन सरिता के साथ बिना अहंकार रहना और यह सब विशेषता अभी तक तो बिलासपुर विधायक में हैं जो उन्हें सत्ताधारी पार्टी के कई नेताओं से बेहतर बनाती है। अब सवाल है बिलासपुर विधानसभा में ऐसे 2 राजनीतिक दल जो इन दिनों खूब कूद रहे हैं पहला झाड़ू बैनर पोस्टर पर डॉक्टर साहब खूब दिखाई देती हैं और आप पार्टी में एक बड़ा वर्ग है जो उनकी चर्चित होने के साथ ही अस्त होने की स्थिति पैदा कर रहे हैं। हाल ही में अपने पुनर्गठन के लिए जिन दो लोगों को कमान दी वे इतने कुशल नहीं है कि चुनाव के पूर्व पार्टी का जनाधार खड़ा कर सके अर्थात जिसे टिकट मिलेगा उसे अपनी जमीन खुद बनानी होगी। अब बात घड़ी की और बंगाली बाबू की नाम बिसवास है पर जिस राजनीतिक दल को वे पकड़ कर बैठे हैं । उसकी विश्वसनीयता छत्तीसगढ़ बिलासपुर दोनों स्थानों पर नहीं है। सबको याद है कि छत्तीसगढ़ में एनसीपी का आगमन कांग्रेस के दलबदलू नेता वीसी शुक्ला के कारण हुआ और उन्हीं के कारण 2003 के चुनाव में कांग्रेस की हार हुई पर 2003 के चुनाव में एनसीपी के बिलासपुर प्रत्याशी को वैसे वोट नहीं मिले जैसे बोर्ड 98 में अनिल टाह को मिले। 2003 में एनसीपी का कैंडिडेट बीआर यादव मुकाबले के बाहर था। फिर कभी घड़ी ने बिलासपुर में घूमने की हिम्मत नहीं की यहां तक की एनसीपी का मुख्य चेहरा भी एनसीपी को छोड़कर कांग्रेस में चला गया। एनसीपी की ओर से जो सूचनाएं छत्तीसगढ़ के संदर्भ में जांची जाती हैं। छत्तीसगढ़ उनके एजेंडे में काफी प्रमुख के नहीं रहा ऐसे में पोस्टर पर बड़े-बड़े कारपोरेट टाइप वाले वादे को मतदाता किस रूप में ले। अनुभवी मतदाता इसे किसी अन्य प्रयोजन से की गई विज्ञापन बाजी के रूप में लेता है शहर में ऐसे मासूम दिखने वाले कुछ चेहरे साईकिल पर भी सवार होकर आए थे वे इंजीनियर थे। पर बाद में कहां गायब हो गए कोई जानता भी नहीं है अभी विधानसभा चुनाव में 7 माह समर अभी शेष है ।