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किसी की टूटी मूर्ति किसी का फूटा सिर किसके लिए.. ?

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समाचार -
बिलासपुर, 3 जनवरी 2023। एक का प्रचार दूसरे का प्रतिकार के बीच धर्म से गायब होता अध्यात्म, सार इतना ही है। मामला चाहे नारायणपुर का हो, मुंगेली का हो या कवर्धा का या फिर बिलासपुर और रायपुर का भारतीय संविधान में धर्म का प्रचार प्रसार मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आता है अभिव्यक्ति की आजादी देश के हर नागरिक को यह अधिकार देती है कि वह अपनी बात को शब्दों से, प्रतीकों से, चित्रों से आगे रख सकता है। दिक्कत तब आती है जब अन्य पक्ष इसका प्रतिकार करता है जो जिसके पास है वही तो बैठता है यह बांटने की प्रक्रिया भांति भी है बांटना समूह में हो सकता है विभाजन कारी हो सकता है और इस विभाजन कारी पद्धति का एक सच यह भी है कि किसी तरह बांटने की प्रक्रिया से वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कराया जाए। छत्तीसगढ़ के जंगल क्षेत्र जो अपने साथ प्रचुर मात्रा में खनिज भी रखता है इन दिनों नए तरीके के समस्या में फंस रहा है। दिखावे के तौर पर यह समस्या धर्म के प्रचार प्रसार से जुड़ी है असल में इसके पीछे बाजारवाद काम कर रहा है। भुगतान की जद में हम आप बाद में आएंगे पर सबसे पहला शिकार यहां का भूमि पुत्र बन रहा है जो असल में इस जल, जंगल और जमीन का ना केवल मालिक है बल्कि रक्षक भी है। पर कुछ ऐसी ताकतें जो स्वयं न तो दिखना चाहती है ना सामने आती है वे बहुत दूर से अपनी इक्क्षित स्थानों को धर्म के नाम पर उलझा कर खाली कराने पर टिकी है। बाजार के ताकत के पास धन इतना होता है कि वह अपना गेम बड़े आराम से खेलता है। कभी इसी बाजार में नक्सलवाद को खेला तो अब धर्म से खेला जाएगा तभी तो धर्म के आध्यात्मिक पक्ष की ओर किसी का कोई ध्यान नहीं चाहता। प्रथम दृष्टि में नारायणपुर जैसे क्षेत्रों की समस्या धर्म प्रचार के कारण पैदा होते दिखाई जा रही है और कहा जा रहा है कि जब किसी के कोर क्षेत्र में घुस ओगे तो परिणाम यही निकलेगा पर ऐसा कहने वाले इस बात को भूल जाते हैं की कोर क्षेत्र में दोनों घुस रहे थे। और यह नहीं बताते किसके कहने पर, असल खेल सत्ता हासिल करने का है और सत्ता भी किसके कहने पर हासिल करना है यह भी खेल है क्योंकि सत्ता का उपयोग जनसेवा नहीं है। सेवा तो उसकी करना है जिसे जंगल के नीचे का खनिज चाहिए बाकी सब दिखावा है।