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30 साल में बिलासपुर क्यों नहीं बन सका महानगर... उबासी, उदासी अपना भला देखने वाला नेतृत्व कितना जिम्मेदार ?

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समाचार -
बिलासपुर, नवंबर 29। 
 
बिलासपुर ने अपना प्रतिनिधित्व जिसे दिया यह बिलासपुर का दुर्भाग्य है कि उसकी सोच इतनी दूर कि नहीं थी की बिलासपुर को महानगर का दर्जा दिला सके। हम इस बात को 30 साल के संदर्भ में कह रहे हैं। 2024 में फिर एक मौका है कि हम ऐसे पॉलिटिकल पार्टी और युवा सोच को मौका दें जिनके पास कॉस्मो पोलियन सोच के साथ आर्थिक, औद्योगिक, सामाजिक राजनीति का लंबा अनुभव है। इसे बिलासपुर के पिछले 30 वर्षों के संदर्भ में दो पड़ाओ मैं समझा जा सकता है। 
पहला पड़ाव मध्य प्रदेश से शुरू होता है बिलासपुर की राजनीतिक हैसियत उस समय जितनी मजबूत थी वैसी दोबारा कभी नहीं बनी, बिलासपुर विधानसभा का विधायक मध्य प्रदेश का उपमुख्यमंत्री था। बिलासपुर में ही स्वास्थ्य मंत्री, विधि विदाई मंत्री जैसे कद्दावर नेता थे, पर बिलासपुर शहर का विकास जबलपुर, नागपुर, रायपुर, इंदौर, भोपाल की तर्ज पर नहीं हुआ। जबकि यहां एसईसीएल का हेड क्वार्टर हुआ करता था। सीधे शब्दों में कहें कहीं ना कहीं बिलासपुर की जनता जिसे अपनी कमान लंबे समय तक सौप के रखी उसका प्रतिफल शहर को नहीं मिला जब छत्तीसगढ़ बनने की शुरुआत हुई तब तक उस परंपरागत सोच वाले नेतृत्व की विदाई हो गई थी, और बिलासपुर में उस वक्त युवा कहे जाने वाले एक नेतृत्व को अपनी कमान दे दी थी। शायद जनता के मन में यह बात कहीं रही होगी कि औद्योगिक परिवार से जुड़ा हुआ नेता युवा शहर को तेजी से बड़े महानगर में तब्दील करने वाली नीति पर चलेगा। 
2001 से 2003 के छोटे से कालखंड को छोड़ दे तो बिलासपुर प्रगति के तेज पहियों पर चलता कभी दिखाई नहीं दिया। 1-2 नहीं पूरे 15 साल प्रदेश में भाजपा की सरकार रही और बिलासपुर विधायक के पास काफी समय खजाने की चाबी रही, औद्योगिक विभाग रहा, वाणिज्य की कमान रही पर शहर की भाग्य रेखा में जीवन रेखा में गड्ढे इस तरह खींची गए, खोदे गए की भारत के नक्शे पर बिलासपुर को खोदापुर की उपमा मिली, साथ में नसबंदी कांड के साथ घर भरने वाला सीवरेज और उद्योग के नाम पर भदौरा मिला। 
15 साल में बिलासपुर से तालाब गायब हो गए जो हमारी धरोहर थे इस बीच में बिलासपुर को जोन मिला पर जोन की लाभ नहीं मिले । धीरे-धीरे दिल्ली का घमंड इतना ऊंचा हो गया कि जोन मुख्यालय की यात्री सुविधा भी दोयम दर्जे की कर दी गई है और बिलासपुर का नेतृत्व केवल निवेदन करता नजर आ रहा है। हाल ही में उन्होंने रेल मंत्री से मुलाकात भी की जनता पूछती है कि डीआरयूसीसी, जेडआरयूसीसी से बिलासपुर के तमाम नामजद निर्वाचित प्रतिनिधि त्यागपत्र क्यों नहीं दे देते। 
बिलासपुर में किसी भी काम की गति इतनी धीमी क्यों हो जाती है की परियोजना शुरू होने के पहले ही दम तोड़ देती है या बासी और पुरानी हो जाती है। आज हमारा नेतृत्व और उसकी सोच इतनी उबासी, उदासी भरी हो गई है कि शहर की सीमा बढ़ाने के बावजूद हम बिलासपुर के आसपास उपनगर निर्मित नहीं कर पाये। अपनी नगर बस सेवा को संचालित नहीं कर पाए। हवाई सुविधा नहीं ले पाए उल्टे रेलवे की यात्री सुविधाओं में पिछड़ते चले गए हैं। बिलासपुर का आर्मी हेड क्वार्टर अब तो जोन मुख्यालय रवानगी की बेला आ गई है। और हमारा नेतृत्व अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने में व्यस्त है। वे लोग भी कम दोषी नहीं जिन्होंने जनमत से चुनकर आए जनप्रतिनिधि का सम्मान नहीं किया अब तो फिर से एक मौका है की जनता अपनी परंपरागत आदत को बदल ले और ऐसे नेतृत्व को ढूंढें जिसके पास बिलासपुर को मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और सटा हुआ महाराष्ट्र नागपुर के बीच स्थापित करने का जुनून हो।