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छत्तीसगढ़ की समकालीन राजनीति में महिलाएं हो रही पुरुषवादी सोच का शिकार
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समाचार :-
बिलासपुर, 9 नवंबर 2022। 11 तारीख को बीजेपी की हुंकार रैली आयोजित है फायर ब्रांड कैबिनेट मंत्री स्मृति ईरानी के आने की खबर से जहां भारतीय जनता पार्टी की महिला नेत्रीया उत्साहित है वहीं अन्य राजनैतिक दलों के नेता अपने अपने बौद्धिक कौशल से हुंकार रैली पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। सबसे पहले आप की भंग इकाई वाली पूर्व शहर अध्यक्ष ने मोर्चा खोला। विज्ञप्ति जारी की पार्टी पर भाजपा की बी टीम होने का आरोप लगता है। दूसरा वक्तव्य एनसीपी के प्रदेश प्रवक्ता ने जारी किया एनसीपी को कांग्रेस का सहयोगी दल माना जाता है। जनवादी मुद्दों पर खामोश रहते हैं। तीसरी पत्रकार वार्ता कांग्रेस के जिला ग्रामीण अध्यक्ष ने ली और आरोपों की लंबी सूची पढ़ दी इन सबके बीच महिलाओं का मूल मुद्दा गायब हो गया बिलासपुर की राजनीति में महिला नेत्रीयों का सशक्त योगदान हमेशा रहा है। यहां से राज्यसभा में भी महिला भेजी गई हैं, पदमा मनहर एक नाम और दूसरा नाम इनग्रिड मैक्लाउड समाज का प्रतिनिधित्व किया कांग्रेस की ओर से अभी भी कई नाम निर्वाचित जनप्रतिनिधि और संगठन में मौजूद हैं।
दो उदाहरण शहजादी कुरैशी नगर पालिक निगम बिलासपुर में पार्षद हैं और संध्या तिवारी पार्षद व एमआईसी सदस्य हैं। कांग्रेस के प्रदेश संगठन में पूर्व महापौर वाणी राव प्रदेश उपाध्यक्ष हैं पर आज की पत्रकार वार्ता में एक भी महिला नेत्रीयों को पत्रकार वार्ता के सामने मौका नहीं मिला या यूं कहें जिला संगठन ने इन्हें योग्य नहीं माना. ..... जब कांग्रेस जैसा स्वतंत्र सोच वाले राजनैतिक दल में पुरुषवादी सत्ता इतनी हावी है तो एनसीपी से क्या उम्मीद करें। उनके बैनर पोस्टर पर तो महिलाएं नेत्री दिखाई देती हैं पर उनकी उपयोगिता शायद उतनी ही हैं, जबकि एनसीपी के हाईकमान की बेटी एनसीपी के संगठन में बड़े पद पर है।
देश की सबसे बड़ी पंचायत में प्रतिनिधित्व करती है पर प्रदेश स्तर पर छत्तीसगढ़ में एनसीपी में महिलाओं को कितना आगे बढ़ाया गया है. ..... ? यहां भी मातृशक्ति केवल पूजा वंदना के लिए बन गई लगती है।
बीजेपी के तो सिद्धांत ही निराले हैं जब सत्ता प्राप्त करनी होती है, बचानी होती है, टीवी पर डिबेट की राजनीति करनी होती है तो महिला नेत्रीयों को आगे बढ़ा दिया जाता है। बॉलीवुड के ग्लैमरस चेहरों पर सीट निकालने का भाजपाई फॉर्मूला तो स्थापित सिद्धांत बन गया है। लगातार चुनाव जीतने वाली मालिनी की उपेक्षा और स्मृति की वंदना सब देखते हैं। रमन सिंह के सामने जब कभी भी दुर्ग की नेत्री सुश्री पांडे ने हुंकार भरी तो भाजपा की पितृसत्तात्मक सोच आड़े आ गई। तखतपुर से भी हर्षिता पांडे को सीट तभी मिली जब कांग्रेस ने यहां से महिला प्रत्याशी उतारा कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में सभी राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर डबल स्टैंडर्ड अपनाया है। यही है राजनीति में पुरुषवादी सोच और दुखद यह भी है कि महिला नेत्री भी इसी पुरुषवादी सोच का शिकार हो गई है।


