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कायस्थ संग ओबीसी ब्राह्मण कैसे करें बर्दाश्त

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समाचार :-
बिलासपुर, 4 अक्टूबर 2022। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त बिलासपुर की राजनीति में बीआर यादव गुट ने लंबे समय तक अपनी चलाई, लेकिन तब इस गुट का नेतृत्व बीआर यादव स्वयं करते थे। एक बार फिर से 2017 में विधानसभा चुनाव में भले ही जनता ने कांग्रेस के ब्राह्मण प्रत्याशी को जिताया किंतु यादव गुट ने कायस्थ के साथ मिलकर निर्वाचित जनप्रतिनिधि को पूरी तरह किनारे लगाते हुए राजनीति में ओबीसी संग कायस्थ की राजनीति चली अपने आर्थिक साम्राज्य के दम पर यह रिश्ता कायस्थ संग ओबीसी हो गया। बीआर यादव गुट का नेतृत्व कब यदुवंशियों के हाथ से निकलकर कायस्थ के पास पहुंच गया यह यदुवंशियों को पता ही नहीं चला। इस बार के विधानसभा में पर्याप्त मात्रा में ब्राह्मण विधायक जीतकर पहुंचे पर जैसा व्यवहार बिलासपुर विधायक के साथ हुआ उसका उदाहरण कोई दूसरा नहीं मिलता, विकास उपाध्याय को मंत्री तो नहीं बनाया गया पर कांग्रेस की राजनीति में उन्हें पर्याप्त सम्मान प्राप्त है वैसी स्थिति बिलासपुर विधायक की नहीं है। 
हाल ही का उदाहरण देखें पहले कायस्थ संग ओबीसी ने अल्पसंख्यक के माध्यम से निगम दशहरा में खेल खेला और पूरी कोशिश कि की पुलिस ग्राउंड में दशहरा उत्सव हो ही नहीं क्योंकि इसके होने पर शहर विधायक को महत्वता देना एमआईसी की मजबूरी है। महापौर जिनकी दिलचस्पी बेलतरा विधानसभा क्षेत्र में रहती है वहां का दशहरा उत्सव उन्होंने पर्यटन निगम को सौंप दिया और स्वयं बी मोर्चा कॉलोनी में स्थापित हो गए ।
अविभाजित मध्यप्रदेश के अंतिम विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश के कद्दावर मंत्री बीआर यादव का टिकट कटा उनके सामने विकल्प था अपने किसी समर्थक को टिकट देते पर उन्होंने पुत्र प्रेम निभाया, परिणाम स्वरूप कृष्ण कुमार यादव कांग्रेस प्रत्याशी बने इस टीम के अनिल टाह को यह नहीं पोसाया लिहाज उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दिया और कृष्ण कुमार यादव के खिलाफ चुनाव में उतर गए। 
राजनीति के जानकार बताते हैं कि अनिल टाह की बिलासपुर की राजनीति को यही योगदान है कि उन्होंने शहर की राजनीति को ओबीसी पॉलिटिक्स से मुक्त किया यदि अनिल टाह चुनाव न लड़ते तो इस बात की पूरी संभावना थी की कृष्ण कुमार यादव भले नहीं जीत पाते पर छाया विधायक का और दूसरे नंबर पर आने का तमगा हासिल कर लेते। 1-2 नहीं पूरे 4 बार भारतीय जनता पार्टी के अमर अग्रवाल ने कांग्रेस को बिलासपुर में मूंग की पटखनी दी । 2 अवसर ऐसे आए जब अमर अग्रवाल की राजनीति को जनता ने स्वीकार नहीं किया। 
पहला महापौर के चुनाव में जब कांग्रेस ने यादव गुट के बाहर निकल कर वाणी राव को टिकट दिया तो जनता ने उन्हें बड़े मतों के अंतर से शहर का प्रथम नागरिक बनाया। फिर वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस ने शैलेश पांडे जो कांग्रेस के कार्यकर्ता थे किसी गुट से उनका कोई नाता नहीं था को टिकट दिया तब जनता ने उन्हें हाथों हाथ लिया राज्य में एक बार फिर से कांग्रेस ने बड़े बहुमत के साथ सरकार बनाई और ओबीसी राजनीति ने निर्वाचित ब्राह्मण विधायक की घोर उपेक्षा की और कांग्रेस के बिना गुट वाले निर्वाचित विधायकों को हाशिए पर ढ़केला। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय बिलासपुर में गूटीय संतुलन बना रहता था, कारण राजेंद्र प्रसाद शुक्ला, अशोक राव, चित्रकांत जयसवाल जैसे दिग्गज नेता इस जिले का प्रतिनिधित्व करते थे। पर छत्तीसगढ़ बनने से तक बीआर यादव गुट का कब्जा हो चला था । वर्तमान में भी शहर अध्यक्ष, जिला ग्रामीण अध्यक्ष, महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष इसी कैंप के प्लेयर हैं। 
बिलासपुर विधानसभा की शहरी राजनीति के मतदाता ने हमेशा नेतृत्व क्षमता को सामने रखकर अपना विधायक चुना है इसे ओबीसी अथवा सवर्ण से ज्यादा नेतृत्व की क्षमता का आंकलन करना आता है, यदि विधानसभा चुनाव के 1 साल पूर्व भी कांग्रेस नेतृत्व ने जनता के इस मूड को नहीं पहचाना और जातिवाद के आधार पर षड्यंत्र की राजनीति करने वालों को बिलासपुर की टिकट दी तो जिले से इस बार कांग्रेस का सफाया हो जाएगा । याद रखे कांग्रेस की हवा में भी बिलासपुर जिले में कांग्रेस को केवल बिलासपुर से ही जीत दी तखतपुर तो सैकडे़ में जीती हुई सीट थी।