No icon

24hnbc

बीजेपी कांग्रेस दोनों ने छोड़ा एसटी को....

24hnbc.com
समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ राज्य में दोनों राजनीतिक दल कांग्रेस व भाजपा ने अपनी नई रणनीति में एसटी वोटरों को उपेक्षित कर दिया। भारतीय जनता पार्टी में पहले संगठन और विधायक के बीच संतुलन था एक पद एसटी को तो एक ओबीसी को मिलता था पर अब ऐसा नहीं है। साहू और कुर्मी मतदाता को अपनी अपनी गोद में बैठालने के चक्कर में दोनों पद ओबीसी खाते में चले गए और ओबीसी में ही दोनों पद साहू खाते में गए। कांग्रेस में बस्तर की सभी 11 सीटें पड़ी हैं उसके बावजूद प्रदेश के मंत्रिमंडल में एसटी मंत्रियों की उपस्थिति प्रभावी नहीं है भले ही कवासी हो, शिव हो या अमर राजनैतिक सक्रियता इन्हें जनता के बीच स्थान नहीं दिलाती। कांग्रेस की पूरी राजनीति पिछले 5 साल से ओबीसी के इर्द-गिर्द घूम रही है और उसी की देखा सीखें भाजपा को सत्ता की चाबी ओबीसी में ही दिखाई दी, जबकि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पीछे जो संकल्पना थी वह तो एसटी जनसंख्या को लेकर थी आरंभ के 3 साल 2001 से 2003 कांग्रेस-भाजपा दोनों ने ऐसा दिखाया भी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री अजीत जोगी एसटी बनाया और भाजपा ने नेता प्रतिपक्ष नंदकुमार साय एसटी दिया किंतु 2003 के बाद एसटी के साथ भाजपा का दिखावटी प्रेम भी खत्म होने लगा पहले डॉक्टर रमन का मुख्यमंत्री बने ना दिखावे के लिए कैबिनेट में रामविचार नेताम, ननकीराम कंवर एसटी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी, पर यह सब दिखावटी मामला था। नक्सल समस्या के नाम पर एसटी से गृह मंत्रालय और उन्हीं के हाथों उन्हीं की अच्छे से ठुकाई इसलिए भाजपा के पूरे 15 वर्ष में एक आध बार ही गृह मंत्रालय किसी स्वर्ण के हाथ गया अन्यथा यह विभाग एसटी विधायक के पास ही रहा धीरे-धीरे आदिवासी वोटरों को छोड़ भाजपा की राजनीति ओबीसी साहू वोटरों के इर्द-गिर्द सीमटती गई कांग्रेस में भी साहू का जवाब कुर्मी में ढूंढा। और बस्तर के भ्रष्ट भाजपाई नेताओं ने स्वयं ही अपनी पार्टी के ताबूत में कील ठोक ली परिणाम एसटी वोटर कांग्रेस की झोली में चले गए परिणाम छत्तीसगढ़ से भाजपा का सफाया हो गया । अमित शाह का नारा अबकी बार 80 पार उल्टा पड़ गया और कांग्रेस 70 से 72 में आ गई असल में इस झटके के बाद भी आरएसएस और भाजपा जंगल में सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे हैं वे एक डंडा और एक कुर्ता बना कर रखे हैं सभी आदिवासी को एक ही डंडे से एक ही कुर्ता पहनाने पर आमादा है लिहाजा आदिवासी का बूढ़ादेव जाग उठा है और उसने भगवा पहनने से इंकार कर रखा है। जिद के आगे मोदी है पहले जिद के आगे जीत थी छत्तीसगढ़ का आदिवासी राजनीतिक परिपक्वता से परिपूर्ण है वो यूं किसी के झांसे में नहीं आता सालों जेल में रह लेता है मुकदमा झेल लेता है किंतु माफी मांग कर बाहर नहीं आता उसे पता है कि सत्ता सताती है और ऐसा व्यवहार केवल पुरुष एसटी का नहीं महिला भी इतनी सक्षम है। उदाहरण सोनी सोरी है खाकी ने वेजाइना में रेत के कण डाल दिए लेकिन सोनी सोरी नहीं झुकी। अब दोनों राजनीतिक दल के लिए आदिवासी उपयोगी नहीं बचे क्योंकि छत्तीसगढ़ के दोनों छोर पर आदिवासी आक्रोशित बैठा है और दोनों राजनीतिक दल उन्हें मनाने नहीं जा सकते। दिखावा कर सकते हैं उन्हें गुमान हैं की एसटी तुम्हें नहीं तो मुझे मिलेगा एक बार तुम्हें मिलेगा दूसरी बार मुझे मिलेगा। अब बारी है मतदाता की वह साहू कुर्मी से ऊपर उठकर भाजपा के ब्राह्मणवाद को समझें और ओबीसी मतदाता का वह वर्ग जो सत्ता की मलाई खाने स्वर्ण के नजदीक आ गया है उससे अपना अधिकार मांगे याद करें उस एसटी नेतृत्व को जो सत्ता के पास चिपक कर केवल अपना भला कर रहा था और वही गुरु मंत्र ओबीसी नेतृत्व ने अपना लिया ब्राह्मणवाद के पास पहुंचकर स्वयं ही ब्राह्मणों जैसा व्यवहार कर रहे हैं और अपने समाज के बेरोजगार वर्ग के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं उनका वोट लेकर मलाई खुद खाते हैं और इसी कुचक्र से आम जनता को बचाना है।