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कौन पेश कर रहा है दावा श्रीकांत की राजनीतिक विरासत पर..... ?

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर । जब कांग्रेस की राजनीति में इंदिरा इज कांग्रेस और कांग्रेस इज इंदिरा का दौर चल रहा था, उस समय कांग्रेस के भीतर ऐसे साहित्यकारों की तूती बोलती थी जिनकी विचारधारा सोवियत संघ और वहां के फंड से पोषित पल्लवित होती थी। ये वह दौर था जब श्रीकांत वर्मा और उनके समान कई लोगों को कांग्रेस ने ना केवल अपने राजनीतिक दल में बड़ा पद दिया साथ ही राज्य सभा में भी रखा ऐसा ही एक नाम श्रीकांत वर्मा का है उन दिनों राजनीति में सवर्ण होना विशेष बात मानी जाती थी जैसा अभी ओबीसी होना है। छत्तीसगढ़ में राजनीति के जानकार बताते हैं कि ब्राह्मणों के वर्चस्व को काउंटर करने के लिए कायस्थ वर्मा जी को लगातार आगे बढ़ाएंगे उनकी एक और जिम्मेदारी यह भी थी कि वे वामपंथी विचारधारा के लोगों का भारत और सोवियत संघ के बीच आयात निर्यात करते रहते थे। उस समय इसे बौद्धिक पर्यटन के रूप में देखा जाता था। 
हमें आज यह सब बता ना इसलिए जरूरी लग रहा है कि इसी साल छत्तीसगढ़ शासन में साल की प्रथम तिमाही में ही श्रीकांत वर्मा पीठ बनाई है और पीठ के बनते ही बिलासपुर के मेडिकल कॉलेज के ऑडिटोरियम में 25 तारीख से दो दिवसीय कार्यक्रम रखा गया है । जून महीने में ही राज्यसभा की 2 सीट खाली हो रही है। पहले श्रीकांत वर्मा राज्यसभा गए फिर कांग्रेस की परंपरा अनुसार उनकी पत्नी वीणा वर्मा राज्य सभा पहुंच गई और उनका कार्यकाल छत्तीसगढ़ बनने के बाद भी चला इसी दौरान राज्यसभा सदस्य होने के नाते उन्होंने अपने बेटे के लिए लोकसभा टिकट की दावेदारी भी की उस वक्त की राजनीतिक पत्रिकाओं में वीणा वर्मा के पुत्र अभिषेक वर्मा का हथियारों के डीलर और उस समय के भ्रष्टाचारों की कहानियां कवर स्टोरी बनी है उस सब के चक्कर में कुछ जेल यात्राएं भी हुई अजीत जोगी की राजनीति ने छत्तीसगढ़ में वर्मा परिवार की राजनीति को खत्म कर दिया। 15 साल भारतीय जनता पार्टी का शासन रहा केंद्र में 10 साल कांग्रेस की सरकार रही किंतु वर्मा परिवार और उसके छत्तीसगढ़िया हित चिंतक बिलासपुर की सरजमीन पर उतरने की हिम्मत नहीं जुटा सके। वर्ष 2022 छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग ने श्रीकांत वर्मा पीठ यूं ही स्थापित नहीं कर दी। इसके पीछे सलाहकारों की एक सोची-समझी रणनीति है जहां पर एक तीर से कई लक्ष्य साधे जा रहे हैं सब कुछ एक सोची-समझी शतरंज की बिसात है और इस बिसात पर लालाओ ने एक बामन साहित्यकार के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साधा है कार्यक्रम की सफलता प्रभाव कौन आया कौन गया किसका चेहरा दिखा किसका छिपाया गया पर सटीक विश्लेषण कार्यक्रम के बाद पढ़ें... । 
 
( शशांक दुबे की कलम से. ... )