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कमीशन का सच और बेकार की कार्यवाही

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। अंबिकापुर, सूरजपुर से सीएम निकले नहीं और जिला पंचायत सीईओ का तबादला आदेश आ गया कहते हैं की सीएम द्वारा यह कार्यवाही भेंट मुलाकात कार्यक्रम में सरपंच संघ की मौखिक शिकायत के बात की गई की कार्य के लिए कमीशन देना पड़ता है। कहते हैं अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी अधिकारी 20% कमीशन के बिना कार्य नहीं कर रहे हैं ऐसा कहा था। छत्तीसगढ़ की इस परिस्थिति को कुछ नए संदर्भों में देखें साधारण जनप्रतिनिधि अधिकारियों के 20% कमीशन की शिकायत कर रहे हैं तो आईएएस अधिकारी का तबादला हो जाता है वहीं पर कोरबा विधायक कैबिनेट मंत्री आईएएस कलेक्टर की शिकायत करता है तो तबादला नहीं होता इस अंतर को क्या समझे। मौखिक शिकायत जनप्रतिनिधियों की शिकायत और एक आईएएस पर गिरी गाज और दूसरी ओर कैबिनेट मंत्री की मौखिक शिकायत लिखित शिकायत और नहीं गिरती कलेक्टर पर गाज, इसे कैसे समझे एक साधारण जनप्रतिनिधि क्या कैबिनेट मंत्री से हल्का है या भारी और पदभार ग्रहण करते समय संविधान की शपथ किसने ली...... सरपंचों ने या कैबिनेट मंत्री ने छत्तीसगढ़ में सरकारी अधिकारियों द्वारा कमीशन खाने की परंपरा पुरानी है। अगर इस शिकायत के आधार पर कार्यवाही होनी है तो पूरे छत्तीसगढ़ में एक रीसाइक्लिंग बिन बना दी जाए और उसमें डालकर तबादले कर दिए जाएं और इससे भी कमीशन खोरी रुकने वाली नहीं है क्योंकि यह एक सर्व स्वीकार व्यवस्था हो गई है यह व्यवस्था 2003 से प्रारंभ हुई 2001 से 2003 के बीच का ही समय ऐसा है जब कमीशन खोरी अपने न्यूनतम स्तर पर थी । 2003 के बाद इसने रफ्तार पकड़ी 2018 के चुनाव के पूर्व अपने ही कार्यकर्ताओं के बीच उस समय के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने कहा था 1 साल के लिए कमीशन खोरी बंद कर दें हमारी सरकार 10 साल टिकेगी। अनुशासित कार्यकर्ताओं ने अपने मुख्यमंत्री की नहीं सुनी सुन लिए होते तो चुनाव न हारते, नहीं सुने इसलिए तो चुनाव हारे। कांग्रेस शासनकाल में भी कमीशन कभी बंद नहीं हुआ और यह कमीशन धान मंडी से शुरू होते हुए हर दफ्तर के सचिव स्तर तक है। पटवारी से लेकर मंत्री बंगला तक है इस व्यवस्था को बदल कौन सकता है। तबादला शासकीय नौकरी में पनिशमेंट है ही नहीं जब जनप्रतिनिधियों की शिकायत पर कान देना था तो बेहतर होता आईएएस अफसर को वही पदस्थ रहने देते और वह शिकायत के बाद और आत्मविश्वास के साथ कमीशन को बढ़ाता और साथ में एसीबी को छूट देते कार्यवाही करने की। परिणाम जब मिलता तब ही जनता को लगता कि सीएम साहब कुछ कर रहे हैं अन्यथा भूपेश है तो भरोसा है यह स्लोगन केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हो सकता है अन्यथा आम जनता को सभी सरकारी दफ्तर तभी जाती है जब उसके जेब में भेंट चढ़ाने के लायक रकम होती है । जनप्रतिनिधियों को कमीशन की शिकायत करना ही नहीं चाहिए क्योंकि सरपंच तो काम लाते ही इसलिए हैं कि कमीशन खाई जाए यह बात बिलासपुर के नजदीक हाईवे पर बसे एक गांव के सरपंच की है सरपंच महोदय ने चुनाव जीतने के बाद 23 लाख के बकरे काट कर खिलाएं अब आराम से वसूल रहे किसी को यह कहानी जाननी हो तो बिलासपुर स्थित पुराना बस स्टैंड में सरपंच की चाय की दुकान पर चले जाएं बकरा काट कर खिलाने की सत्यता पता चल जाएगी।