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सरकारी रईसी चलाने रोज बेच रहे पीएसयू नुमाइंदे क्यों भेजे जनता
- By 24hnbc --
- Thursday, 14 Apr, 2022
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। सब कुछ लुटा देते लुटा दिया है 3 चीज तो छोड़ दे शिक्षा, पानी और स्वास्थ पूर्व में इन तीनों क्षेत्रों में 4% निजीकरण था अब 7:5% है। ऐसे में जनता अपने नुमाइंदे चुनकर विधायिका में क्यों भेजे जब सब कुछ का निजीकरण हो गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वर्णिम काल चल रहा है अमृत उत्सव चल रहा है समझे 3 शब्दों के खेल को, डिसइनवेस्टमेंट, प्राइवेटाइजेशन मोनेटाइजेशन में पहले के लिए लक्ष्य जो रखा गया था वह था 4 लाख 26 हजार करोड़ अचीव हुआ 30 लाख 50 हजार करोड़ प्राइवेटाइजेशन में 23 लाख करोड़ की संपत्ति को बेचा गया मोनेटाइजेशन में लक्ष्य रखा गया 1 लाख करोड़ और अचीव हुआ 97 हजार करोड़ जिन क्षेत्रों में निजीकरण नहीं किया जाता था रेलवे, पावर, डिफेंस और खदान उसे भी बेच दिया गया यही है आजादी का अमृत उत्सव। सेंधमारी, दिवालियापन, खोखलापन उजागर ना हो के लिए सबसे अच्छा तरीका है जबरदस्त प्रोपेगेंडा वाले विज्ञापनबाजी और जनता को अन्य का भय दिखाकर एक खास रंग में रंग देना जिससे वह बढ़ती बेरोजगारी को भूल जाए। ऐसा नहीं है कि विनिवेश के चलते पहले वीआरएस नहीं दिया गया आंकड़े बताते हैं उस समय बैंक बीएसएनएल और रेलवे में वीआरएस दिया गया था तब कुल मिलाकर 1 लाख 50 हजार लोगों ने वीआरएस लिया किंतु अभी तो मात्र बीएसएनएल में ही डेढ़ लाख लोगों को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हम क्रमवार चर्चा करें कि देश का कौन सा प्रधानमंत्री किस रूप में पहचाना जाता है। जवाहरलाल नेहरू को मिश्रित अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक उद्योगों को खड़ा करने वाला, लाल बहादुर शास्त्री को किसानों के साथ खड़े होने वाला, इंदिरा गांधी को बैंक पीएसयू और खदान का निजीकरण करने के लिए मुरारजी को मल्टीनेशनल के विरोध के लिए, राजीव गांधी को कंप्यूटर के लिए, बीपी को करप्शन के विरोध में, चंद्रशेखर को स्वर्ण रखकर कर्जा लाने के लिए पीव्ही नरसिम्हा राव और मनमोहन को आर्थिक सुधार के लिए अटल को भी इसी क्रम में रखा जाता है । भारतीय अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक बुरा दौर 90-91 में था। जब देश के फॉरेन रिजर्व में केवल 2.5 हजार करोड डॉलर बचा था सब विदेशी कर जीडीपी का 23% था आज 21% है। हम स्वयं देखें हम कहां जा रहे हैं उस समय इंटरनलडेप्थ 51% थी और अब 50% है उस समय की राजनीतिक सत्ता कमजोर थी तब भी मजबूती से मुकाबला किया अब तो राजनीतिक सत्ता इतनी मजबूत है कि किसी की सुनती ही नहीं 19 जून 1991 पीव्ही नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री पद संभाला और 25 जून 1991 को मनमोहन सिंह को देश का वित्त मंत्री बना दिया तब कॉमर्स मिनिस्टर पी चिदंबरम थे और उद्योग मंत्रालय पीजी पुरियन के हाथों था । 43 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा गया 400 बिलीयन डॉलर लाए गए पीएसयू कि उत्पादन इकाइयों में डाले गए सर्विस सेक्टर खड़ा हुआ कृषि मजबूत हुई और हम यह दावा करते थे की देश पूरे विश्व की आर्थिक मंदी के बावजूद मजबूती से खड़ा है। हमारा दावा था के अनुसार अमेरिका के 50,000 रोजगार हमारी अर्थव्यवस्था के कारण चलते थे। 2014 में इंटरनलडेप्थ 37 % थी आज 51 % है 91 में विदेशी कर्जा 8.5 हजार डालर था । 2014 में 427 मिलियन डॉलर था और अभी 563 मिलियन डॉलर है यह स्थिति तब है जब हम अपने लाभ में चलने वाले पीएसयू को भी सस्ते में बेच रहे हैं । 2014 में 131 पीएसयू में 1 करोड़ 43 लाख लोग रोजगार पा रहे थे अभी इनकी संख्या आधी हो गई है सब का निजीकरण हो गया । सार्वजनिक क्षेत्र को बेच कर निजी क्षेत्र को मजबूत किया गया। देश की जीडीपी और रसातल में जाएगी बेरोजगारी लगातार बढ़ेगी 2000 से 2004 डिसइन्वेस्टमेंट का टारगेट 58500 करोड़ का अचीवमेंट 24300 करोड का हुआ मनमोहन सिंह के समय विनिवेश 153000 करोड का था एक्यूमेन 114000 करोड का हुआ अब 2014 से 2020 के बीच डिसइनवेस्टमेंट निजीकरण और मोनेटाइजेशन के लक्ष्य और अचीवमेंट हमने शुरू में ही बताए हैं । शिक्षा, पानी और हेल्थ सब का निजीकरण हो चुका है ऐसे में जब सब कुछ निजी क्षेत्र को ही करना है तो जनता अपनी टैक्स की गाढ़ी कमाई जनप्रतिनिधियों को क्या राज्यसी ठाट बाट के लिए दें आखिर अब जब डिफेंस खदान और रेलवे का भी निजीकरण हो गया है तो सरकार की जरूरत ही क्या है. . .।


