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अंबेडकर की जयंती 1972 में 654 बागियों का समर्पण और धर्म की अफीम

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर । आज तारीख 14 अप्रैल है एक तरफ विभिन्न राजनीतिक दल और बहुत सारे संगठन डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती मना रहे हैं। आज ही के दिन 1972 में 654 बागियों ने महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने मुरैना से जोरा स्थित मैदान में आत्मसमर्पण किया था। यह आत्मसमर्पण तीन स्थानों पर हुआ एक जोरा जहां पर 450 बागियों ने समर्पण किया। राजस्थान के तालाब शाही में 104 और उत्तर प्रदेश के बटेश्वर में 100 बागियों ने। इसी के साथ खुली जेल भी प्रारंभ हुई 5 से 10 साल अशोकनगर मुंगावली में बागियों को जिन्हें हम डकैत कहते थे रखा गया सजा पूरी होने के बाद सभी को रिहा किया गया। सरकार द्वारा दी गई जमीन पर वे खेती करने लगे और समाज के मुख्यधारा में शामिल हुए। आज मुरैना के जोरा स्थित गांधी सेवा आश्रम में स्वर्ण जयंती समारोह है यहां पर उस समय के समर्पित बहादुर सिंह, अजमेर सिंह, सोने राय आज बताएंगे कि समर्पण के बाद जीवन के अनुभव कैसे रहें और वह क्या परिस्थितियां थी उन्होंने समाज की मुख्यधारा से बगावत की थी। यह जानना जरूरी है कि उस समय एसएन सुब्बाराव, जय प्रकाश नारायण और विनोबा भावे को बागियों से समर्पण कराने के लिए 1-2 माह नहीं 7 साल लगे थे। 7 वर्षों की मेहनत ने 654 बागियों के मस्तिष्क को इतना निर्मल किया वे गांधी के तस्वीर के सामने हथियार रखने को तैयार हुए। स्वतंत्र भारत में आज का दौर सबसे खतरनाक परिस्थितियों का दौर है श्रमिकों के हित चिंतक मार्क्सवादी लेखक कार्ल मार्क्स ने कहा है धर्म अफीम है और इसका नशा इसलिए कराया जाता है कि समाज में आर्थिक संसाधनों का बंटवारा कुछ विशेष लोगों के पास संचित रहे आज हमारा समाज उस स्थिति पर पहुंच गया है देश में आर्थिक संसाधन कुछ 100 लोगों के पास केंद्रित हो गए हैं और बाकी करोड़ों लोगों के लिए धर्म अफीम है। जब कोई भी देश युद्ध के मैदान में जाता है तो वह दूसरे राष्ट्र की शक्ति तौलता है। यदि विरोधी के पास एफ -16 है तो युद्ध रत देश उससे भी बेहतर विमान ले आता है या कम से कम उस स्तर का विमान तो ले ही आता है किंतु धर्म के नशे के साथ यह बड़ा सहज है एक वर्ग नशा कर लेता है दूसरा वर्ग इससे ज्यादा नशा करने की सोचता है और नशा कराने वाला जिसके पास रखता है वह तो यही चाहता है कि सब लोग ज्यादा से ज्यादा नशा कर लें और अपने अपने रंग के झंडे लेकर सड़क पर डट जाएं हाल ही में हमने रामनवमी मनाई मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम पर देश के 7 राज्यों में जो हुआ उसे देख कर आने वाले समय में होने वाली परशुराम जयंती को याद कर कर कपकपी छूटती है क्योंकि परशुराम जी मर्यादा पुरषोत्तम नहीं थे उनके बारे में उनके मानने वाले ही बताते हैं कि उन्होंने एक दो बार नहीं 21 बार सत्ताधारीओं का नाश किया था और उस समय के सत्ताधारी क्षत्रिय होते थे ऐसी कहानी पर विश्वास करके यदि हिंसा भड़की तो परिणाम क्या होगा? आज अंबेडकर जयंती है अब हम याद करें कि भीमराव अंबेडकर ने हिंदू धर्म के बारे में राष्ट्र निर्माण के बारे में क्या कहा था। उनकी पुस्तक हिंदू वांग में खंड 15 पृष्ठ 365 में जो लिखा है उसे इनवर्टेड कामा में बताया जा रहा है " अगर वास्तव में हिंदू राज बन जाता है तो निसंदेह वह इस देश के लिए एक भारी खतरा होगा हिंदू कुछ भी कहे हिंदुत्व स्वतंत्रता समानता और भाईचारे के लिए एक खतरा है इस आधार पर यह प्रजातंत्र के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है हिंदू राज को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए " सामाजिक एकता के बिना राजनीतिक एकता संभव नहीं है इसलिए हम बार-बार कहते हैं कि संवैधानिक राष्ट्रवाद ही एकमात्र रास्ता है लोक कल्याण को छोड़कर हम पूंजीवाद के लुटेरों के साथ खड़े नहीं हो सकते जाति का विनाश, संपत्ति ही शक्ति का स्रोत है धर्म, सामाजिक स्थिति और संपत्ति इन तीनों के साथ सत्ता की जुगलबंदी संसद न्यायपालिका और कार्यपालिका यहां तक कि मीडिया के हाथों में भी बेडी डाल रही है। सेक्यूलर डेमोक्रेटिक ताकतों को एक होना ही होगा देश में इन दिनों जो बुलडोजर आज चल रहा है वह सर्वथा अनुपयुक्त है बुलडोजर किसी के घर पर नहीं कानून पर भी चल रहा है आखिर हमने जिस संविधान के अनुसार चलने की प्रतिज्ञा ली है शपथ ली है उस पर यदि जेसीबी चले तो बिलासपुर के लोगों ने उसका सही नाम दिया जो कलेक्टर बोले.... इन सब परिस्थितियों में हमें सोते जागते उठते बैठते बार-बार यह समझना होगा की हम पूंजीवाद के सहारे देश खड़ा नहीं कर सकते क्योंकि आसमान में जाने वाला रॉकेट जैसे जैसे ऊपर जाता है वह नीचे के इंजन को गिराता जाता है हम दूसरों को ऊपर पहुंचाने के लिए और ऊपर पहुंचाने के लिए क्या स्वयं का बलिदान करेंगे या एक शांत विकास के लिए समर्पित आर्थिक संसाधनों के सही बंटवारे वाला समाज बनाएंगे।