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मैदानी क्षेत्र में बढ़ रहा है बाहरी दबाव कैसे बचेगी मूल संस्कृति
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। नवंबर माह में छत्तीसगढ़ राज्य में 3 सामाजिक राजनैतिक धार्मिक घटनाक्रम देखने मिल रहा है। जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि स्थानीय संस्कृति बाहरी के दबाव में आ गई है और वह दिन दूर नहीं जब मैदानी क्षेत्र का जनप्रतिनिधित्व बाहरी लोगों के हाथ में चला जाएगा राज्य सरकार ने बड़े जोर शोर से राज्य स्थापना दिवस मनाया और इस बात के लिए मुख्यमंत्री को साधुवाद। लेकिन वह इस तीखी आलोचना से नहीं बच सकते कि उन्होंने आदिवासी संस्कृति को प्रदर्शनी की वस्तु बना दी विशेषज्ञ जानते हैं कि आदिवासी संस्कृति अपने मूल स्थान पर किस बुरे दौर से गुजर रही है जब मूल स्थान पर ही संरक्षण नहीं होगा तो उन्हें 24 घंटे या 3 दिन किसी एक स्थान विशेष में प्रदर्शनी की वस्तु बनाकर संरक्षण नहीं होने वाला आखिर इसी परेशानी के चलते सर्कस समाप्त हुआ और जानवरों को जंगल में भेजना पड़ा अथवा चिड़ियाघर के स्वरूप को भी बहुत तेजी से बदलना पड़ा जब चौपाई को प्रदर्शनी की वस्तु नहीं बनाया जा सकता तो जीती जागती आदिवासी संस्कृति को कृतिम गांव बनाकर प्रदर्शनी की वस्तु क्यों बनाया जाए। दूसरा लगा सवाल दीपावली के बाद खड़ा हुआ जब पूरे राज्य में मैदानी इलाकों में जोर शोर से छठ पर्व मनाया गया बिलासपुर में ही उदाहरण ले 2001 से ही अरपा नदी के किनारे एक बड़ा क्षेत्र छठ समिति को सौंप दिया गया है पहले यह क्षेत्र नगर पालिक निगम बिलासपुर के सीमा रेखा के बाहर आता था तब पहली बार 2001-2002 में एक साधारण धनराशि निगम ने छट समिति को दी थी उस वक्त इस बात का विरोध कुछ जनप्रतिनिधियों ने किया था और बाकायदा तत्कालीन कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा था देखते-देखते छठ का स्वरूप बिलासपुर में इतना बढ़ता गया कि उसके पूर्व के आयोजन अब फीके पड़ते जा रहे हैं हर साल के अनुसार इस साल भी छठ घाट पर दोनों राजनीतिक दल के जनप्रतिनिधि बड़ी संख्या में पहुंचे वोट की राजनीति यहां पर साफ दिखाई देती है । बाहरी राज्यों से आए सक्षम लोग हमेशा यह बात कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के नेता आपस में मनमुटाव कर कर चल रहे हैं हम अपने राज्य में सबके बीच समझौता करा देते हैं उन्ही की बातों से ऐसा लगता है कि वे बिलासपुर में भी स्वयं को किंग मेकर समझ रहे हैं अगर समय रहते स्थानीय संस्कृति को सहेजा नहीं गया तो किंग मेकर तो दूर बाहरी लोग पहले किंग बनेंगे और बाद में मेकर इसी माह दीपावली के बाद परंपरागत रूप से राउत नाचा का कार्यक्रम होगा । पूर्व की अपेक्षा अब इस कार्यक्रम में सांस्कृतिक महत्व तेजी से घटा है और कई महीनों में यह हुड़दंग साबित हो जाता है आयोजकों को समय रहते इस समस्या पर ध्यान देना चाहिए। पिछले 2 वर्षों में कविड के चलते बड़े स्तर पर राउत नाचा का कार्यक्रम नहीं हुआ तो इस बार मौका है कि पिछली गलतियों से हटकर कुछ परंपरा को जीवित किया जाए। अब बात शहर में स्थित देश की नवरत्न कंपनी एसईसीएल की जो कई वर्षों तक अरपा महोत्सव मनाती रही जो कि 3 दिन का होता था अरपा नदी की रेत पर 3 दिन तक छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति और लेखा-जोखा एक ही जगह दिखाई देता था वह भी बाजारवाद के दबाव से मुक्त होकर किंतु ऐसा क्या रहे की नवरत्न कंपनी अपने इस योग्यदान से या भूमिका से पीछे हट गई। यदि स्थानीय जनप्रतिनिधि एक बार पुनः इस परंपरा को जीवित करा सके तो शहर के लिए यह गौरव का विषय रहेगा।


