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माइंड, मेन ,मनी ,तीन एम पर घातक कोविड

24HNBC भारत में ऐसा सोचने, कहने वाले असंख्य लोग है जो कहते है अमेरिका, योरोप में इतने लोग मर गए तो उस नाते भारत विश्व गुरू है। भारत में कोरोना काबू में रहा। बाकि देश संर्घष करते हुएहै जबकि भारत विजेता! हमें क्या बचना बल्कि हम दुनिया को बचातो हुए!हमने टीका बनाया। सबके टीका लग जाएगा तो वायरस खत्म!वायरस को हरा देने की हमारी लड़ाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेमिसाल कामयाबी!भक्तों के, मुंगेरीलालों के मुंह में घी शकर। ईश्वर करें इनका महामारी के आगे यह महामृत्युंजय जाप सफल हो। लेकिन अपना मानना है कि इन बातों से ही कोरोना वायरस को भारत में जड़े जमाने का गजब मौका मिला है। भारत ने महामारी की लड़ाई में एक साल गंवाया। दुनिया के देशों ने महामारी की विपदा में चिकित्सा खर्च बढ़ाया। ब्रिटेन ने नेशनल हेल्थ सर्विस में बजट उड़ेल दिया। नए अस्पताल., चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हुआ लेकिन भारत में क्या हुआ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार, प्रदेश सरकारों को यह सूझा ही नहीं कि भारत की आबादी इतनी बड़ी है कि वायरस यदि सर्वत्र पहुंचा तो संक्रमण काल सालों लंबा चलेगा  और उस नाते दीर्घकालीन जरूरत में संक्रमण ईलाज का उपजिला-तहसील स्तर का मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर बने व उसके लिए कम से कम तीन-चार-पांच साल की योजना तो बने।भूल जाए कि 2021 के बारह महिने टीकाकरण चला तो भारत सन् 2022 में महामारी मुक्त होगा।  मैं पिछले साल फरवरी-मार्च से अब तक लगातार लिखता रहा हूं कि वैश्विक स्तर की महामारी यदि घोषित है तो उससे इंसान को लंबे समय तक जुझते रहना होगा। भारत के लिए सन् 2020-21 ज्यादा खराब होगा। और तो और भारत ने वैक्सीनेशन में भी झूठी-आत्मघाती एप्रोच अपनाई है। केंद्र सरकार अपने एकाधिकार में जैसा मनचाहा टीकाकरण बना रही है उससे यह नोट करके रखे कि कोरोना वायरस का भारत में तांडव दुनिया का सर्वाधिक लंबा व कई सालों का होगा।क्यों? बड़ा कारण उत्तर भारत के हिंदी प्रदेश, खासकर गंगा किनारे के प्रदेश है। उत्तराखंड से लेकर उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचलप्रदेश सबने पिछले एक साल में जिस रीति-नीति में काम किया है वह महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु राज्यों से जुदा है। दक्षिण के प्रदेशों में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर अच्छा है और लोग, प्रदेश सरकारें अपेक्षाकृतजागरूक है तो वहां पहले दिन से लगातार टेस्टींग पर जोर है और प्रोफेशनल चुस्ती-काबलियत के साथ। इन प्रदेशों में लोगों की संजीदगी से संक्रमण अधिक पकड़ा गया और उस अनुसार मेडिकल बंदोबस्त बनते गए। वह एप्रोच बिहार, यूपी, बंगाल आदि में कहीं नहीं है और वहां जो है वह आंकडों के झूठ में है। कई बार लगता है बिहार, यूपी, झारखंड, ओडिसा, पश्चिम बंगाल मानों आधुनिक चिकित्सा, सभ्यता से अलग हो। पृथ्वी का संक्रमणप्रूफ भूभाग।मगर ऐसा सन् 1915-18 की महामारी के वक्त भी था। तब भी स्पेनिश फ्लू का विषाणु मुंबई के रास्ते गुजरात, पंजाब से बढ़ते-बढ़ते बहुत बाद में गंगा किनारे पहुंचा था और दुनिया में विषाणु फैलाव के आखिरी दौर में ही उत्तर भारत में लाखों-करोडों लोगों की जान लील गया था। मोटी बात पिछला एक साल इस बात का गवाह है कि दक्षिण भारत की मेडिकल चुस्ती-ईमानदारी से संक्रमण के आंकड़े अधिक है तो संकट और ईलाज के प्रति लापरवाही भी नहीं है। वहां संक्रमण की सच्चाई का सच्चाई से वैसे ही सामना है जैसे अमेरिका, ब्रिटेन में हो रहा है। ये महामारी के आगे फेल प्रदेश नहीं है बल्कि फेल, नाकारा प्रदेश वे है जहां की सरकारों ने टेस्टींग के प्रति लापरवाही रखी हुई है। इन सरकारों को आंकड़ों से डर है न कि फैलते हुए संक्रमण से। ये इस सोच में काम करते हुए है कि कोरोना महामारी को मौसमी फ्लू बना डालों ताकि झूठ चलता रहे कि वायरस है कहां! जब ऐसा है तो भारत में न टीकाकरण चौतरफा पुख्ताई होगा और न ईलाज से वायरस पर अंकुश बनेगा।