
24HNBC झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के ग्रामीण इलाकों में परंपरा के नाम पर अंधविश्वास का ऐसा खेल खेला जाता है जिसमें मां अपने बच्चे को गोद में लेकर गर्म सलाखों से उसका पेट दगवाती हैं। मां मानती है की उसके बच्चे का दगा पेट उसकी पेट की बीमारियों को दूर कर देगा। बच्चा रोता भी है तो मां मुस्कुराती है।यह परंपरा यहां वर्षों से चली आ रही है। कई बार इसके चक्कर में छोटे बच्चों की जान तक चली जाती है। फिर भी झारखंड सरकार इस क्रूर परंपरा पर रोक नहीं लगा पा रही है। इस बार भी कोल्हान क्षेत्र के पूर्वी सिंहभूमके ग्रामीण इलाकों में ऐसे दर्दनाक दृश्य देखने को मिले। सरकार के सारे प्रयास कभी-कभार आदिवासियों के गांवों में निकाली जाने वाली जागरूकता रैलियों तक सीमित हैं। परंपरा को आस्था का विषय बताकर अधिकारी इससे ज्यादा कुछ नहीं करते। छोटे-छोटे बच्चों को इस परम्परा के नाम पर कितनी दर्दनाक पीड़ा से गुजरना पड़ता है इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। मकर संक्रांति के दूसरे दिन सुबह आदिवासी बहुल इलाके में ओझा अलाव जलाते हैं, उसमें चार मुंह वाले सलाख को तपाते हैं। वहींं एक खाट बिछी होती है जिसमें बच्चे को लाकर लिटाया जाता है। उसके हाथ-पैर जकड़ दिए जाते हैं। जाड़े के मौसम में बच्चे के शरीर से कपड़े उतार दिए जाते हैं। कपड़े हटने के बाद बच्चे की नाभि के आसपास चार जगहों पर सरसों का तेल लगा कर उसमें गर्म सलाखों से दाग लगाएजाते हैं। इस दौरान पूरा गांव बच्चों की चीत्कार से गूंजता रहता है। बच्चा जोर-जोर से रोता है लेकिन परिवार के सदस्य उसे इतनी जोर से पकड़कर रखते हैं कि वह तड़प भी नहीं पाता है। दागने के बाद दाग वाले स्थान पर फिर से सरसों तेल लगा दिया जाता है। दुधमुंहे से लेकर पांच साल तक के बच्चों को इस असहनीय पीड़ा से गुजारा जाता है।