24hnbc पीआरओ विवाद वित्तीय आरोप की जांच के लिए बनी समिति
Friday, 09 Oct 2026 18:00 pm
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रायपुर / मुंगेली 10 अक्टूबर 2026
मुंगेली जिले में पदस्थापना के दौरान तत्कालीन सहायक संचालक एवं जनसंपर्क अधिकारी (DPRO) पर लगे कथित वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोपों के मामले में शासन स्तर पर बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया गया है। नवा रायपुर स्थित तूता धरना स्थल पर मीडिया प्रतिनिधि खेमेश्वर पुरी गोस्वामी द्वारा किए गए अनशन और लगातार उठाई जा रही मांगों के बाद जनसंपर्क संचालनालय, छत्तीसगढ़ ने प्रकरण को संज्ञान में लेते हुए दो सदस्यीय जांच दल का गठन कर दिया है। संचालनालय ने जांच अधिकारियों को पूरे मामले का सूक्ष्म परीक्षण कर तीन कार्यदिवसों के भीतर स्पष्ट अभिमत सहित प्रारंभिक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
विदित हो कि शिकायतकर्ता खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (जिला मुंगेली) द्वारा मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (1076) में दर्ज शिकायत (क्रमांक WP260500179499) में आरोप लगाया गया था कि मुंगेली पदस्थापना के दौरान तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ के नाम व तत्कालीन डीपीआरओ/सहायक संचालक सुजीत सिंह द्वारा जिले के विभिन्न विभागों से स्वतंत्रता दिवस एवं सौजन्य भेंट के नाम पर कथित रूप से 32 से 35 लाख रुपये की अवैध वसूली कर राशि का बंदरबांट किया गया। इस शिकायत में विभाग के तत्कालीन अधिकारी की संलिप्तता का स्पष्ट आरोप लगाया गया था।
आयुक्त के अनुमोदन से जारी हुआ आदेश, वरिष्ठ अधिकारियों को मिली जांच की कमान जनसंपर्क संचालनालय द्वारा 9 अक्टूबर 2026 को जारी अधिकृत आदेश के अनुसार, शिकायत के तथ्यों की वस्तुस्थिति स्पष्ट करने एवं नियमानुसार प्रारंभिक जांच संपादित करने हेतु संतोष मौर्य (अपर संचालक) एवं जितेन्द्र नागेश (संयुक्त संचालक, नवा रायपुर) को जांचकर्ता अधिकारी नियुक्त किया गया है। आयुक्त जनसंपर्क द्वारा अनुमोदित इस आदेश में निर्देशित किया गया है कि संबंधित शिकायत का त्वरित परीक्षण कर तीन दिवस के भीतर अपनी रिपोर्ट संचालनालय को सौंपें। इस आदेश की प्रतिलिपि कलेक्टर मुंगेली, उप सचिव जनसंपर्क विभाग तथा संबंधित अधिकारियों को भी आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रेषित की गई है।
सत्याग्रह का दिखा असर, अब पारदर्शी जांच पर टिकी निगाहें
प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि शासकीय मशीनरी में जब किसी लोक सेवक पर वित्तीय कदाचार अथवा आचरण संहिता के उल्लंघन के आरोप लगते हैं, तो तय समय-सीमा के भीतर प्राथमिक जांच बिठाना प्रशासनिक शुचिता और पारदर्शिता की अनिवार्य कसौटी है। पूर्व में विहित अवधि में संज्ञान न लिए जाने से क्षुब्ध होकर जब अनशनकारी ने नवा रायपुर में लोकतांत्रिक व शांतिपूर्ण सत्याग्रह की राह पकड़ी, तो आखिरकार शासन को इस संवेदनशील मामले में त्वरित संज्ञान लेना पड़ा।
अब इस बात पर सभी की निगाहें टिकी हैं कि गठित दो सदस्यीय जांच दल तीन दिनों की निर्धारित मियाद में वित्तीय लेन-देन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े किन साक्ष्यों को आधार बनाकर अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट शासन को सौंपता है, ताकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच शुचिता व विश्वसनीयता पुनः स्थापित हो सके।
जांच आदेश में शिकायतकर्ता को प्रतिलिपि न होना: प्रशासनिक प्रक्रिया की चूक अथवा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन?
जनसंपर्क संचालनालय, छत्तीसगढ़ द्वारा 9 अक्टूबर 2026 को जारी कार्यालयीन आदेश (क्रमांक 5559) के माध्यम से मुंगेली जिले के कथित वित्तीय कदाचार मामले में दो सदस्यीय जांच दल का गठन किया गया है। इस आदेश का परीक्षण करने पर एक गंभीर विधिक विसंगति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है—आदेश की पृष्ठ संख्या 1 एवं 2 पर प्रतिलिपि (सूचनार्थ) की सूची में संचालक, कलेक्टर मुंगेली, उप सचिव, संभागीय संयुक्त संचालक, संबंधित अधिकारी एवं गार्ड फाइल तक को शामिल किया गया है, किंतु मूल शिकायतकर्ता खेमेश्वर पुरी गोस्वामी को इसकी अधिकृत प्रतिलिपि या सूचना प्रेषित नहीं की गई है।
जब किसी मामले में नागरिक या पत्रकार द्वारा ठोस साक्ष्यों के आधार पर शिकायत दर्ज कराई जाती है, तो जांच दल के गठन की अधिकृत सूचना शिकायतकर्ता को देना अनिवार्य प्रशासनिक शिष्टाचार एवं विधिक औचित्य का हिस्सा है।
प्रशासनिक शब्दावली में इसे 'एक्स-पार्टी' या 'एकतरफा जांच' की श्रेणी में देखा जा सकता है, जो किसी भी गंभीर वित्तीय अनियमितता के मामले में निष्पक्षता के विधिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरती। यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक जांच में मनमानापन व अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
जनसंपर्क संचालनालय द्वारा जांच दल का गठन करना निश्चित ही सत्याग्रह और जनशिकायत का प्राथमिक प्रशासनिक परिणाम है। किंतु, शिकायतकर्ता को सूचनार्थ प्रतिलिपि न भेजना प्रशासनिक प्रक्रिया की एक गंभीर चूक प्रतीत होती है। यदि प्रशासन सचमुच शुचिता और पारदर्शिता स्थापित करना चाहता है, तो जांच दल को सर्वप्रथम शिकायतकर्ता को लिखित नोटिस देकर उनके साक्ष्य संकलित करने चाहिए, ताकि जांच की विधिक विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक गरिमा अक्षुण्ण बनी रहे।
वहीं शिकायतकर्ता अनशनकारी गोस्वामी ने कहा कि यदि जांच दल एकतरफा रिपोर्ट प्रस्तुत कर देता है, तो इसे प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी, जहाँ अदालत से मांग की जाएगी कि ऐसी एकतरफा जांच रिपोर्ट को निरस्त कर स्वतंत्र अथवा न्यायिक निगरानी में पुनः जांच का आदेश दे जिसे निष्पक्ष न्याय हो सके।