पीआईएल जनहित या निजहित? न्याय मित्र की दिखावटी तटस्थता जनहित और निज हित के बीच झूलता न्याय
Thursday, 01 Oct 2026 18:00 pm
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बिलासपुर, 2 अक्टूबर 2026।
क्या छत्तीसगढ़ में पीआईएल के आवरण में निजी हित साधे जाते हैं। न्याय क्षेत्र में पीआईएल जन हित याचिका एक ऐसा न्यायिक अस्त्र है जिससे सरकारें भी डरती है। भारतीय न्याय इतिहास में एक समय था जब साधारण पोस्टकार्ड पर भेजी गई तथ्यात्मक बात को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने पत्र याचिका मानकर सुनवाई प्रारंभ कर दी थी और यहीं से आम जनता को पता चला कि जनहित याचिका भी होती है और इसके द्वारा ऐसी बात जो नागरिकों के बड़े समूह के हित में हो रखी जा सकती है। 2001 के पूर्व छत्तीसगढ़ क्षेत्र की नागरिक समस्याएं जनहित के रूप में जबलपुर उच्च न्यायालय पहुंचे ऐसा काम ही होता था जब छत्तीसगढ़ राज्य पृथक हुआ और बिलासपुर में उच्च न्यायालय स्थापित हुआ तो नागरिक संगठन और कुछ व्हीसील ब्लोअर व्यापक जनहित के मुद्दों को लेकर न्यायालय आने लगे।
बिलासपुर में छत्तीसगढ़ राज्य का मेंटल हेल्थ सेंटर इसी तरह की जनहित याचिका का परिणाम है। पर जनहित याचिकाएं कभी-कभी गहरी षड्यंत्र का इशारा भी करती है हालांकि कोर्ट जनहित याचिकाओं को स्वीकार करने के पहले पर्याप्त इतिहात रखता है। राज्य सरकार का एक विभाग जिसका नाम में ही कल्याण शब्द लगा है जनहित याचिकाओं का टारगेट रहा है। एक जनहित याचिका दाखिल की गई और इस विभाग के कई अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच बैठ गई हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उसे पर स्थगन दे दिया। इसी विभाग में एक योजना के कार्यान्वयन पर प्रश्न उठाते हुए एक जनहित याचिका उच्च न्यायालय में लगी हुई है। परंपरा है कि न्यायालय ऐसे मामलों में न्याय मित्र जिन्हें कोर्ट कमिश्नर भी कहा जाता है नियुक्त कर देती है। देखा जा रहा है कि कुछ न्याय मित्र न्यायिक सक्रियता के पीछे अनइथिकल दाव पेज में लग जाते हैं। जिस स्थान पर पहुंचकर उन्हें तथस्ठ होकर स्थिति को देखना चाहिए वहां वे स्वयं पक्ष बन जाते हैं। यह भी पता चला है कि वे निर्देशित स्थान पर अकेले न जाकर अपने रिश्तेदार को ले जाते हैं जो की किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है। अभी हाल ही में तो एक न्याय मित्र अपने साथ पीटीशनर के अधिवक्ता को ले गए। इसे सामान्य तो नहीं कहा जा सकता आखिर याचिका करता का अधिवक्ता याचिका करता और उसके अधिवक्ता का निजी हित जनहित कब से हो गया। इसे जनहित याचिका का मुख्य बिंदु ही यह है कि आवेदक स्वयं इस परियोजना का एक सेंटर चलता था उसके सेंटर में एक लाभार्थी का यौन शोषण हुआ और विभाग ने मान्यता समाप्त कर दी। इस घटना के कुछ महीने बाद आवेदक ने वेश बदलकर जनहित याचिका प्रस्तुत कर दी और वह न्यायालय में स्वीकार भी हो गई तब से यह प्रकरण लगातार चल रहा है 3 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है और दांव पेच जारी है। सरकारी विभाग में शीर्ष पदों पर तबादले हो चुके हैं उसे समय के कुख्यात अधिकारी या तो बदले गए या रिटायर्ड हो गए और अब नए अधिकारी हैं जिन अधिकारियों पर सीधा दबाव पड़ने के लिए याचिका लगी वे तो निकाल लिए।