24hnbc भाजपा का नबीन टेंशन
Sunday, 20 Sep 2026 18:00 pm
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बिलासपुर, 21 सितंबर 2026।
आज शहर में एक हफ्ते से जन्मदिन की धूम है। जन्मदिन कई नेताओं के हैं और उन्हें एक राजनीतिक नजरिए से देखा भी जा सकता है पर हमारी चर्चा चुनावी है और यह भाजपा का नबीन टेंशन बनने वाला है। कहते हैं जहां गुड़ होता है वहां मक्खियों आती है और यह मक्खियों तो बड़ी है बड़ी पूंजी वाली है। पहले पार्टी जिसे छत्तीसगढ़ के चुनाव में रुचि है और केंद्र में भाजपा की सहयोगी है।
रिपब्लिक ऑफ़ इंडिया (आरपीआई) आठव्वले ग्रुप और दूसरा शिवसेना एकनाथ शिंदे ग्रुप पिछले हफ्ते ही आरपीआई के नेता लगातार केंद्र में मंत्री आठव्वले छत्तीसगढ़ आए थे। खाने को वह अपनी विभाग के योजनाओं की समीक्षा कर रहे थे पर असल में उनके सिपाह सलार छत्तीसगढ़ में उनके इशारे पर राजनीतिक संभावनाएं तलाश रहे हैं और वह भी चुनावी, मंत्री महोदय ने कोई छुपाओ भी नहीं किया रायपुर और बिलासपुर दोनों जगह उन्होंने खुलकर कहा 8 से 10 सीट चाहिए विधानसभा चुनाव में नहीं मिली तो... पार्टी से उम्मीदवार सीधे उतारे जाएंगे। बिलासपुर में नेताजी के आसपास जो महिला नेत्री सक्रिय थी उन्हें राजनीति में काफी समय हो गया बिलासपुर सहित प्रदेश के कांग्रेस भाजपा का नेताओं से उनके अच्छे समीकरण रहे हैं केमिस्ट्री भी अच्छी थी और वे बिलासपुर जिले के कोटा विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ भी चुकी है। मेहनती है, महत्वाकांक्षी है और किसी भी छल कपट से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहती है। आरपीआई महाराष्ट्र की राजनीति में दलित वोटो के दम पर राजनीति करती है और छत्तीसगढ़ में तो एससी आरक्षित सीटों की संख्या काफी है।
अब दूसरा पूंजी पति चेहरा शिवसेना एकनाथ शिंदे गुट और उनके राष्ट्रीय समन्वयक चुनाव गठबंधन अभिषेक वर्मा भारत में इस नाम को रक्षा सौदों के ब्रोकर के रूप में पहचाना जाता है। गूगल पर अभिषेक वर्मा डालते ही पता चलता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियारों की सप्लाई रक्षा सौदे में इस नाम का क्या महत्व है। जब तक छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार थी अभिषेक वर्मा के पिता श्रीकांत वर्मा साहित्यकार/राजनीतिक कांग्रेस से नजदीकियां थी। जब कभी भी अभिषेक वर्मा और उनकी पत्नी छत्तीसगढ़ आते थे कांग्रेस के कई नेता डोलते नजर आते थे। सरकार गई वर्मा जी गए रंग बदल क्योंकि हथियारों की चर्चा तो सरकार और सत्ता के साथ ही हो सकती है लिहाजा वर्मा जी देश के औद्योगिक राजधानी मुंबई और महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज शिंदे वाली शिवसेना को थामा और अब बार-बार बिलासपुर के लाडले सपूत बना रहे हैं। पूरी नजर चुनाव पर है और सीधे मैदान में नहीं तो किसी और तरीके से निर्वाचित प्रतिनिधित्व तो लेना ही है। अब बात नबीन टेंशन की आरपीआई हो या शिवसेना इनका छत्तीसगढ़ में अपना वोट बैंक नहीं है और उतरेंगे तो भाजपा के वोट में ही सेंध मारेंगे। वैसे भी वर्तमान राजनीतिक हालात बता रहा है कि अब किसी नॉन बायोलॉजिकल चेहरे पर वोट नहीं मिलेगा और जिसे टिकट मिलेगी उसे अपनी मेहनत करनी होगी।