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लाभ देना राजा बना देना और प्रक्रिया में निपटा देना सब है उनके हाथ में दंड या न्याय सवाल लागू करने वालों पर है
Wednesday, 09 Sep 2026 18:00 pm
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रायपुर, 10 सितंबर 2026।
फूफा जी का नमस्ते और दिमागी नक्सली का प्रणाम अलग-अलग घटनाएं पर न्याय कहीं नहीं दंड संहिता हो या न्याय संहिता...
लगता है पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में बीएनएस लागू होने के बाद दंड संहिता के अंतर्गत दर्ज हुई शिकायत के चालान जमा करना पुलिस भूल गई है। कम से कम सिविल लाइन थाना रायपुर के संदर्भ में तो यह कहा ही जा सकता है। 
19.6.2025 को धारा 420, 467, 468, 471, 34 के तहत 22:16 पर यह एफआईआर क्रमांक 281/ 2025 दर्ज हुई। अपराध का समय 29.9.2022 से 12 .6 .2024 है और आरोपी जयदीप रॉबिंसन, नितिन लॉरेंस, रूपिका लॉरेंस, एसके नंदा, अजय उमेश जेम्स, बीके नायक है। इन सब को उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत मिल चुकी है पर आज तारीख तक सिविल लाइन थाना रायपुर अपनी जांच पूरी नहीं कर सका। इसके पहले इस एफआईआर दर्ज न होने के पीछे भी एक लंबी कहानी और समय अवधि है। पूरा मामला छत्तीसगढ़ डायोसिस अपंजीकृत के पदाधिकारी और छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ़ एजूकेशन के कथित पदाधिकारियों का है। धारा जो लगी है उससे ही पता चलता है कि पूरा मामला दस्तावेजों का है और इन दस्तावेजों को उस समय के जांच अधिकारी ने एकत्र भी किया बड़ी गंभीरता के साथ पर आज तारीख तक चालान प्रस्तुत न होने से इस सोच को बल मिलता है कि देरी जानबूझकर होती है। 
छत्तीसगढ़ की जांच एजेंसियों का हाल यही है 2003 के पीएससी घोटाले की ईओडब्ल्यू जांच हुई और मामला 2026 तक कोर्ट के पास नहीं पहुंचा। इस पीएससी घोटाले के पांच अभियुक्त थे सामान्य बुद्धि बताती है कि जब यह घोटाला हुआ तब उनकी आयु लगभग 50 वर्ष से अधिक की रही होगी आज 2026 है 23 वर्ष हो गए तो वे सब लगभग 65 साल के पार के हैं और सीनियर सिटीजन में गिने जाते हैं। 23 साल के दौरान उन्होंने अपनी-अपनी मोती मेडिकल फाइल तैयार कर ली होगी। इन लोगों के चलते पीएससी में चयनित जी लोगों को फायदा हुआ उनमें से कई को आईएएस अवार्ड हो चुका जिनके साथ जायजत्ती हुई जिनमें अवसर खत्म किए गए हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय कोर्ट से अपने प्रकरण जीत गए और मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। लाभ प्राप्त कर रहे अधिकारियों को स्टे आर्डर मिल गया। उच्चतम न्यायालय के पास यह प्रकरण लगभग 6 साल से है और उच्चतम न्यायालय प्रभावित से कह रहा है समझौता कर ले और अब ईओडब्ल्यू की जांच कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है जिन्हें मजा मारना था उन्होंने पूरा शो एंजॉय किया पद पर बैठकर ना जाने कितने गलत काम किये वे तो उसे पद के योग्य ही नहीं थे किसी अन्य की हक की जगह पर बैठे थे। ऐसे में समझौता जताएगा की हमारा समाज जब प्रक्रिया में किसी को लाभ देता है तो वह पूरी प्रक्रिया किसी दूसरे के लिए सजा हो जाती है और प्रक्रिया में किसी को जेल भेज देता है तो भले ही मामला झूठा हो जिसके हाथ में पावर था वह मजे में और जिस पर गाज गिरी उसे जीवन बर्बाद।