24hnbc सेंदरी में 20 हजार SqFt जमीन घोटाला: 19 को मौत का सर्टिफिकेट, 16 को फौती... अब जवाब कौन देगा?
Monday, 07 Sep 2026 18:00 pm
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बिलासपुर, 8 सितंबर 2026
बिलासपुर जिले के सेंदरी में करीब 20 हजार वर्गफीट जमीन से जुड़े कथित फर्जीवाड़े ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सामने आए करीब एक माह गुजर चुका है, लेकिन तत्कालीन पटवारी नवीन त्रिपाठी पर लगाए गए गंभीर आरोपों के बावजूद कार्रवाई का कहीं अता-पता नहीं है। शिकायत हुई, दस्तावेज सामने आए, जांच का भरोसा भी मिला—लेकिन नतीजा अब तक सिफर।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—क्या पटवारी को किसी रसूखदार का संरक्षण हासिल है या फिर प्रशासन खुद इस मामले पर पर्दा डालने में जुटा है?
मामला खसरा नंबर 2108/2 की करीब 20 हजार वर्गफीट जमीन से जुड़ा है। शिकायत के मुताबिक जमीन जेके एस प्लास्टिक फर्म और कृष्णलाल गोस्वामी के नाम संयुक्त रूप से दर्ज थी।आरोप है कि एक भागीदार को मृत बताकर उसका नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाने की प्रक्रिया की गई। इसके बाद जमीन के स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जमीन के बाद के लेन-देन को लेकर है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि बाद में यही विवादित जमीन तत्कालीन पटवारी नवीन त्रिपाठी की सास गीता पटेल, पति कौशल पटेल के नाम खरीदी गई और वहां प्लॉटिंग की गई। राजस्व रिकॉर्ड की कथित गड़बड़ी , पद, प्रक्रिया और निजी लाभ के पुख्ता दस्तावेजों के बाद भी अभी भी पटवारी के खिलाफ कार्यवाही नहीं होने से प्रशासन कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है !
डेथ सर्टिफिकेट बाद में, फौती प्रतिवेदन पहले!
मामले का सबसे विस्फोटक सवाल दस्तावेजों की तारीखों को लेकर है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित व्यक्ति का मृत्यु प्रमाण-पत्र नगर निगम द्वारा 19 अक्टूबर 2023 को जारी किया गया। वहीं आरोप है कि तत्कालीन पटवारी ने 16 अक्टूबर 2023 को ही तहसीलदार के समक्ष फौती नामांतरण का प्रतिवेदन पेश कर दिया था। यानी दावा सही है तो मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी होने से तीन दिन पहले ही फौती नामांतरण की कार्रवाई आगे बढ़ा दी गई!
अब प्रशासन को साफ-साफ बताना चाहिए—
16 अक्टूबर को प्रतिवेदन किस दस्तावेज के आधार पर बना?
क्या उस समय मृत्यु का कोई अन्य वैध प्रमाण उपलब्ध था?
रिकॉर्ड तैयार करने से पहले दस्तावेजों का सत्यापन किसने किया?
और सबसे अहम—अगर प्रक्रिया में गड़बड़ी नहीं थी तो इन तारीखों का अंतर सामने कैसे आया?
जांच के नाम पर एक महीने से सिर्फ इंतजार
मामला सार्वजनिक होने के बाद तत्कालीन एसडीएम मनीष कुमार साहू और तहसीलदार प्रकाशचंद साहू ने शिकायत प्राप्त होने तथा जांच कराने की बात कही थी।
लेकिन अब सवाल यह है कि जांच आखिर पहुंची कहां?
एक महीना बीत गया। क्या जांच पूरी हुई?
अगर पूरी हुई तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
अगर जांच में प्रथमदृष्टया गड़बड़ी मिली तो कार्रवाई क्यों नहीं?
और अगर आरोप निराधार हैं तो शिकायतकर्ता को स्पष्ट जवाब क्यों नहीं दिया गया?
'जांच कराएंगे' कहकर जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
पटवारी पर कार्रवाई नहीं तो सवाल प्रशासन पर भी उठेंगे
किसी कर्मचारी पर आरोप लगना और आरोप साबित होना दो अलग बातें हैं। लेकिन जब दस्तावेजों की तारीखों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हों, जमीन की खरीद में कथित रूप से पटवारी के रिश्तेदार का नाम सामने आ रहा हो और शिकायत के बाद भी कार्रवाई लंबित हो, तब प्रशासन की निष्क्रियता खुद सवाल बन जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और अगर आरोप गलत हैं तो पटवारी को क्लीन चिट दी जाए। लेकिन यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो निलंबन, विभागीय कार्रवाई और आवश्यकतानुसार एफआईआर में देरी नहीं होनी चाहिए।
अब सिर्फ पटवारी नहीं, पूरे सिस्टम की जांच की मांग
ग्रामीणों ने मांग की है कि जांच सिर्फ तत्कालीन पटवारी तक सीमित न रखी जाए। फौती नामांतरण से लेकर नामांतरण आदेश और जमीन की खरीद-बिक्री तक जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच हो।
यह भी देखा जाए कि प्रक्रिया में किन अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका रही और जमीन की खरीद के पीछे वास्तविक लेन-देन क्या था।
प्रशासन के सामने पांच सीधे सवाल
1. 19 अक्टूबर का मृत्यु प्रमाण-पत्र और 16 अक्टूबर का फौती प्रतिवेदन—आखिर यह कैसे हुआ?
2. एक माह बाद भी कथित रूप से जिम्मेदार कर्मचारी पर कार्रवाई क्यों नहीं?
3. जमीन की खरीद में पटवारी की सास का नाम सामने आने की जांच कब होगी?
4. नामांतरण प्रक्रिया में शामिल अन्य अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका कब तय होगी?
5. आरोप सही पाए गए तो एफआईआर और विभागीय कार्रवाई की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
अब चुप्पी नहीं, जवाब चाहिए
सेंदरी का यह मामला अब सिर्फ एक जमीन के विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल बन चुका है कि राजस्व रिकॉर्ड में नियम चलेंगे या रसूख?
प्रशासन के पास जांच का अधिकार है, दस्तावेजों की जांच करने की जिम्मेदारी है और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई करने की शक्ति भी।
अब जरूरत सिर्फ आश्वासन की नहीं, निष्पक्ष जांच और स्पष्ट कार्रवाई की है।
एक महीने की चुप्पी ने सवाल और बढ़ा दिए हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इन सवालों का जवाब कार्रवाई से देता है या यह कथित जमीन घोटाला भी सरकारी फाइलों के नीचे दबकर रह जाता है।