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24hnbc बोया पेड़ बबूल का, तो आम की आशा क्यों करते हैं
Monday, 03 Aug 2026 18:00 pm
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बिलासपुर, 4 अगस्त 2026। 
किसी भी जिले में प्रेस क्लब का गठन करने का उद्देश्य क्या होता है और यह उद्देश्य कितना वास्तविक और कितना दिखावटी है। वास्तविक और दिखावटी का संतुलन ही यह तय करता है कि क्लब कब तक सकारात्मक रहेगा और कब उसके झगड़े विवाद, आर्थिक अनियमितताएं बाहरी फोरम पर आ जाएगी। बिलासपुर प्रेस क्लब का गठन के वक्त का कागज उठाकर देखिए कौन पत्रकार था और कौन व्यापारी... खाता संभालने की जिम्मेदारी पत्रकार को मिली थी या व्यापारी को और चंदा एकत्र करने का गुण असल में है किसका ? 
प्रारंभ में तो चुनाव भी नहीं होता था सब कुछ सहमति से तय हो जाता था फिर अध्यक्ष पद से चुनाव पर विगुल फूंका और एक आदमी को अपना भगवान मानने की प्रथा शुरू हो गई । एक ईश्वर बात कहा जा सकता है। राजनीति में जब विधायक निधि ने प्रवेश किया तभी से क्लब में नोटों की खुशबू आई कितने सांसद विधायकों से फंडिंग ली गई और उसका क्या उपयोग हुआ किसी को नहीं पता प्रभावशीलता थी तो वर्तमान स्वर्ण जयंती नगर के पास पत्रकार कॉलोनी के लिए भूमि भी मिल गई आज वहां जाकर देखा जा सकता है कि कितने पत्रकारों को वास्तविक रूप से कितने पत्रकारों को वास्तविक रूप से भूमि मिली थी और उसमें से कितनों ने अपना आशियाना वहां बनाया। जिन्होंने नहीं बनाया उन्होंने अपने भूमि के टुकड़े को बेचा। जब तक राघवेंद्र राव सभा भवन के एक छोर पर साधारण जगह थी शांति थी सजावट आई पैसा आया साथ में झगड़ा भी लाया। क्लब के खाते में केवल इस रकम का आना दिखाया गया जो पत्रकार वार्ता की फीस के रूप में आता था। 
छत्तीसगढ़ राज्य बनाने के साथ सुविधाएं बढ़ी तो विवाद भी बढ़े और आरोपी का एक ऐसा दौर शुरू हुआ जिसमें से अधिकांश आप की सच्चाई कभी पता नहीं गई। जब सहकारिता के नाम पर व्यवसाय करने, सरकार से जमीन मांगी गई और गृह निर्माण सहकारी समिति बनी सरकार ने तो अच्छी नियत से एकड़ो में जमीन दी पर यहां तो पत्रकारों के नेता के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। सहकारिता की आड़ में इस समिति के जो भी पदाधिकारी बने उन्होंने जमीन और मकान का सपना दिखा दिखा कर अपने आर्थिक विकास को गढ़ा। क्लब और समिति पर यदि एक साथ कब्जा हो गया तो करेला नीम चढ़ा नहीं हुआ तो अशांति दोनों जगह जैसे-जैसे पद के साथ अर्थ जुड़ता गया कोर्ट कचहरी भी खूब हुई जो बदस्तूर जारी है।
सुनने में तो यहां तक आता है कि क्लब की सदस्यता के पीछे भी बहुत कुछ मुद्रा राक्षस की भूमिका होती है। जमीन आवंटन में जितने घोटाले हैं यदि शब्द की जांच हो जाए रजिस्ट्री में मिला पैसा और सहकारी समिति का अकाउंट जांच के दायरे में आ जाएगा तो कई महानुभावों को अग्रिम जमानत लेना पड़ेगा। विधायक, सांसद निधि का हिसाब मांगा जाए तो मुंह फूल जाएंगे पर मेंढकों को इकट्ठा करना जैसी हल्की बात कह कर पत्रकारों को कोई बिजोलिया तो कोई मेंढक बोल देता है और आर्थिक घपला छुपाए जाते हैं। इस बार निर्वाचित पदाधिकारी का आपसी विभाग कलेक्टर के पास से और ऊपर तक जाएगा पर इतना तय है कि दिखावे की ही सही एकता नहीं होगी।