24hnbc श्रमिकों की नाराजगी सच्चाई है महतारी वंदन से उसे ढाका नहीं जा सकता
Tuesday, 21 Apr 2026 18:00 pm
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बिलासपुर, 22 अप्रैल 2026।
देश में श्रमिकों की सौदेबाजी की क्षमता पूर्व की अपेक्षा गिरी है और कार्य स्थितियां बिगड़ी है। नतीजा बढ़ती श्रमिक अशांति है इस समय दिख रही श्रमिक अशांति का एक परिणाम एफएमसीजी जैसे रोजमर्रा की वस्तु बनाने वाली कंपनियों पर पड़ा है। इक्विटी निवेशक भारत की एफएमसीजी कंपनियों से पैसा निकाल रहे हैं उन्हें लगता है कंपनियां के बिक्री और मुनाफे में बढ़ोतरी नहीं होगी। बढ़ोतरी का संबंध आम जन की आमदनी और उपयोग से है। कोरोना कल के पहले हफ्ते में जितना घंटे का काम मिलता था उस काम मिल रहा है।
भारत की श्रम शक्ति में 56 फ़ीसदी हिस्सा स्वरोजगार कर्मियों का है जनवरी से दिसंबर 2025 की अवधि में ऐसे कर्मियों को उपलब्ध काम के घंटे में कमी आई है। जुलाई 2018 से जून 2019 के बीच ऐसे कर्मियों को हफ्ते में 46.6 घंटे का काम मिल जाता था 24-25 में यह औसत 39.6 घंटे हो गया। दिहाड़ी और वेतन भोगी कर्मियों के कामकाजी घंटे 43.01 और 50.02 से घटकर 41.2 और 48.8 घंटे रह गए सीधा अर्थ है आमदनी घट गई गांव में कामकाजी घंटे 2018-19 में 38.2 की तुलना में 2025 में 32.6 घंटे रह गया अर्थात शहर हो या गांव दोनों जगह श्रमिकों की सौदेबाजी की क्षमता कम हो गई। कंपनियों में उनसे न्यूनतम वेतन पर 12 घंटे का काम लिया जा रहा है जो वेतन मिलता है उसे रोजमर्रा की जरूरते पूरी नहीं होती है और आप कितना भी नारी शक्ति वंदन करें महिला श्रमिकों की हालत खराब है और नोएडा की हालत सूरत की स्थिति भयावह सच्चाई है। जिसे महतारी बंधन से ढाका नहीं जा सकता।