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24hnbc न्याय व्यवस्था के तीन मामले बता रहे हैं बदबू तेजी से बढ़ गई है।
Monday, 20 Apr 2026 18:00 pm
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बिलासपुर, 22 अप्रैल 2026। 
2 दिन के भीतर भारतीय न्याय व्यवस्था के एक जैसे मामले में अलग-अलग चेहरे दिखाई दिए। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ के जज जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने खुद को राहुल गांधी पर एफआईआर के मामले से स्वयं को अलग कर लिया। सोमवार को उन्होंने याचिकाकर्ता की एक पोस्ट से नाराज होकर यह फैसला लिया। याचिका करता ने सोशल मीडिया में एक पोस्ट किया था कि यदि आपने किसी से पैसा लिया है तो उसे वापस कर दें... अन्यथा आपको जेल जाना होगा।
इस पोस्ट में किसी जज का जिक्र नहीं है याचिका करता भाजपा का कार्य करता विग्नेश शिशिर है। दूसरा मामला दिल्ली का है। मामला केजरीवाल आबकारी कांड है। याचिकाकर्ता जस्टिस स्वर्ण कांता की बेंच में पुरजोर तरीके से कह रहा है कि उसे बेंच पर भरोसा नहीं है और वह बार-बार जस्टिस को एक राजनीतिक दल के प्रति झुका हुआ बता रहा है। और इतने स्पष्ट आरोपी के बाद जस्टिस है कि मामले को सुनने से छोड़ ही नहीं रहे हैं। तीसरा मामला सुप्रीम कोर्ट का है, सुप्रीम कोर्ट ने सेलिब्रिटी मैनेजर दिशा शालियन मामले में वकील निलेश ओझा की उसे याचिका को खारिज कर दिया जिसमें मुंबई हाई कोर्ट की तरफ से उनके खिलाफ शुरू की गई अवमानना कार्यवाही को चुनौती दी गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहां की प्रेस कांफ्रेंस करके भ्रष्टाचार का आरोप लगाना न्यायपालिका की न्यू पर प्रहार है। आदेशों की कानूनी आलोचना संभव है लेकिन जज की निष्ठा पर व्यक्तिगत कीचड़ उछलना पेशेवर मर्यादा के विरुद्ध है। ये तीनों मामलों में कहीं ना कहीं जस्टिस पर शंका जाहिर की जा रही है। पहला मामला जस्टिस विद्यार्थी का है याचिकाकर्ता ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में अनर्गल प्रलाप किया और जस्टिस ने इस मामले से स्वयं को हटा लिया। जबकि याचिकाकर्ता जो कुछ भी कह रहा है उसमें जस्टिस का नाम नहीं है और टीका टिप्पणी कोर्ट के बाहर है। पर जस्टिस विद्यार्थी ने जो किया वह ठीक किया। दूसरी और याचिका कर्ता दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कोर्ट के भीतर अपने मामले की पैरवी खुद कर रहे हैं। वे जो कुछ भी कोर्ट के भीतर कह रहे हैं सब रिकॉर्ड में लिया जा रहा है। पर जज साहिबा कह रही है कि, अगर वह खुद को अलग करती है तो यह विवेक नहीं बल्कि कर्तव्य से पीछे हटना होगा। और इससे निराधार आरोपों को वैधता मिलेगी। उन पर भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़े होने का खूब आप लगता है। तीसरा मामला महाराष्ट्र का है अधिवक्ता महोदय ने महाराष्ट्र हाई कोर्ट के एक जज के खिलाफ पत्रकार वार्ता की हाई कोर्ट महाराष्ट्र ने उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ की और सुप्रीम कोर्ट महाराष्ट्र उच्च न्यायालय की कार्यवाही को उचित बता रहा है। तीनों मामले अपने-अपने स्तर पर देश की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं। न्यायपालिका में वह सब बदबू है जो राजनीति में है, कार्यपालिका में है, व्यवस्थापिका में है और मीडिया में है। समाज की जो गंदगी गलीचे के नीचे छुपा कर रखी गई थी अब पूरी तरह बाहर आ गई है।