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आंगनवाड़ी में नहीं जाएंगे बच्चे क्योंकि सहायिका है दलित कैथोलिक ने चुना दलित बिशप
Monday, 16 Feb 2026 18:00 pm
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बिलासपुर 17 फरवरी 2026। 
थे कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस ऑफ़ इंडिया सीबीसीआई ने उन धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द करने की मांग की है जो संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत दी गई धार्मिक स्वतंत्रता के अनुरूप नहीं है। भारत के तमाम धार्मिक समितियां को सीबीसीआई के नए अध्यक्ष कोडिनल एंथोनी पुला की इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वे भारत के पहले दलित हैं जिन्हें यहां पद मिला। हम अपने आसपास के धार्मिक समितियां के मुखियाओं को याद करें कहां किसी दलित को यह सम्मान मिला है। उन्होंने अपनी पहली पत्रकार वार्ता में दमदारी से कहा ईसाई समुदाय के सामने सबसे बड़ी समस्या है कुछ राज्यों में कानूनों का हो रहा दुरुपयोग। कानून का शीर्षक है धर्म की स्वतंत्रता पर उसका गलत इस्तेमाल हो रहा है और झूठे केसों में लोगों को फसाया जा रहा है। 
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ स्थान पर एक ईसाई पादरी पादरी की तरह कपड़े पहनकर नहीं जा सकता यह भेदभाव भारतीय संविधान के खिलाफ है। उन्होंने बेबाकी से कहा अगर हम सच में धर्मांतरण करने पर मजबूर कर रहे होते तो हमारी आबादी 2.7 फ़ीसदी से 2.3 फ़ीसदी कैसे हो जाती उन्होंने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान को औपचारिक नोटिस जारी किया है। हम धर्मों की बराबरी चाहते हैं क्योंकि हम कोई विदेशी धर्म नहीं है। हम भारतीय धर्म हैं पहली सदी से ही ईसाई भारत में मौजूद हैं। हमने राष्ट्र निर्माण में किसी भी समुदाय से ज्यादा योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि कैथोलिक का एक बड़ा वर्ग दलित समुदाय है यदि इसमें प्रोस्टेट को भी जोड़ ले तो यह बहुत बड़ा हो जाता है। कैथोलिक बिशप की बैठक का महत्व बहुत बढ़ जाता है खासकर तब जब भारत के विभिन्न राज्यों के अलग-अलग हिस्सों में लक्षित करके ईसाई समुदाय के साथ हिंसा होती है। 
इतिहास के पन्नों में जो घटनाएं दर्ज है ऐसी घटना जो पूरे देश का सर नीचा करती है उड़ीसा में एक फादर स्टैंन को उन्हीं की कार में बंद करके आग लगा देना उसके बावजूद उनके परिवार ने अपराधियों को माफ किया और उड़ीसा के कालाहांडी क्षेत्र में सेवा कार्य करते रहे। एक तरफ मसीही समाज में भेदभाव होता ही नहीं और दूसरी और हम सतत भेदभाव की ओर बढ़ते हैं। उड़ीसा के जिला केंद्रपाड़ा ब्लॉक राजनगर गांव घड़ियां माल के आंगनबाड़ी केंद्र में गांव के लोगों ने अपने बच्चों को इसलिए भेजना बंद कर दिया कि सहायिका शर्मिष्ठा सेठी दलित है। शर्मिष्ठा सेठी की पूरी कहानी बीबीसी ने रिपोर्ट की है रिपोर्ट कहती है कि 21वीं सदी में भी जाति भारत की सच्चाई है। रिपोर्ट में यह भी है की जाति एक सांस्कृतिक मुद्दा बन चुका है और उसकी जे और गहरी होती जा रही है। शर्मिष्ठा सेठी की नौकरी 20 नवंबर 2025 को लगी और उनकी जाति के आधार पर उनका विरोध शुरू हो गया। उनके नियुक्ति के खिलाफ कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ के दफ्तर के बाहर तक प्रदर्शन हुए एक तरफ हम दिल्ली में एआइ समिट की बात करते हैं और दूसरी और एक जिले में आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों को केवल इसलिए नहीं भेजा जाता की वहां की सहायता दलित है। जिले के कलेक्टर ने जब स्वयं हस्तक्षेप किया आंगनबाड़ी केंद्र में शर्मिष्ठा के हाथ की बनी खिचड़ी खाए तब कहीं जाकर केंद्र में 10 परिवारों के बच्चे आए। अभी भी 12 परिवारों के बच्चे नहीं आ रहे हैं अब इसी मामले को यूजीसी की नई गाइडलाइन से जोड़ के देखें। 
सवर्ण के आंदोलन से धरती डोल उठी भूचाल आ गया सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई करके स्टे दे दिया। पूरे गोदी मीडिया ने सवर्ण के आंदोलन को खूब कवर किया पर इसी मीडिया ने उड़ीसा की इस घटना को स्थान नहीं दिया एक दलित कैथोलिक समुदाय का अगवा बना कितने हिंदी पट्टी के अखबारों ने इस बात को प्रमुखता से छापा। पर किसी प्रदेश का सवर्ण मुखिया दलित मतदाता के घर खाना खा लेगा तो मीडिया रात दिन दिखाएगा। 
मध्य प्रदेश की घटना याद करें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने एक दलित नागरिक को आवास बुलाया उसके पैर धोए और उनके साथ हुई घटना पर माफी मांगी घटना क्या थी एक सवर्ण युवा ने उसे एसटी वर्ग के व्यक्ति के मुंह पर पेशाब कर दी थी और अपने कृत्य का वीडियो भी बनाया था। इस पूरे मामले में सवर्ण व्यक्ति द्वारा किए गए निंदनीय मृत की जितनी चर्चा नहीं हुई उससे ज्यादा कवरेज मुख्यमंत्री के प्रोपेगेंडा को मिला। हम इतनी कटुता के दौर में पहुंच चुके हैं कि अपराधों को भी जाति धर्म के आधार पर देखते हैं और उसकी आलोचना भी यह देखकर करते हैं कि अभियुक्त किस जाति वर्ग का है।