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24hnbc बधाई देकर तथ्यों को छुपाना मीडिया की आदत
Saturday, 15 Nov 2025 18:00 pm
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बिलासपुर, 16 नवंबर 2025।
आज सुबह पत्रकार साथी प्रेस स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना में दे रहे हैं और तथ्य यह है कि हर रोज तथ्यों को उजागर करने के स्थान पर छुपाने की कला में प्रवीणता हासिल कर रहे हैं। एक उदाहरण देखें उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ में ईएसआईसी योजना के तहत उपचार कर रही आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर श्रीमती शोभा शर्मा के इलाज में लापरवाही करने वाले दो अस्पताल के जांच के लिए बनाई गई कमेटी को ही अवैध करार दिया। जो तथ्य समाचार में छुपाया गया वे इस प्रकार है.... शोभा शर्मा के पति रितेश शर्मा बिलासपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि के कर्मचारी हैं और वह मशीन विभाग में कार्यरत थे। कई अखबार के समाचार में अस्पताल का नाम छुपाया गया। अस्पताल का नाम लालचंदानी अस्पताल जो ऑर्थोसर्जरी के लिए नमचीन है। दूसरा अस्पताल आरबी इंस्टिट्यूट, इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस बिलासपुर शहर का नाम चिन अस्पताल है। अब सवाल है कि इन तीनों तथ्यों को लिखने या बोलने से समस्या क्या है। अस्पतालों से विज्ञापन का मद भारी भरकम है। जब मन तब विज्ञापन अस्पताल से प्राप्त हो जाता है। इस तरह अस्पताल का विज्ञापन प्रेस वालों के लिए नमक है और इसकी हलाली मीडिया जगत निभाता है। दूसरा शोभा शर्मा और उसके पति जब आरबी अस्पताल में भर्ती थे तब हमने उनके पीड़ित पत्नी से बात की थी उस समय बिलासपुर प्रेस क्लब के चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी। मामला लगभग 2 साल पूर्व का है। उन्होंने बताया था ऑपरेशन के समय में बार-बार, डॉक्टर तो शल्य चिकित्सा कर रहा था को बता रही थी कि तकलीफ बाएं पैर में है आप ऑपरेशन दूसरे पर का कर रहे हैं। जब पूरी सर्जरी हो गई और डॉक्टर साहब को अपनी गलती का एहसास हो गया तो उन्होंने वास्तविक पीड़ित पैर की सर्जरी निशुल्क करने का ऑफर दिया। लगा प्रबंधन की स्कीम है एक के साथ एक पैर की सर्जरी फ्री... तीन कपड़े खरीदिए दो फ्री पाइए। यदि यही हाल रहा तो बाईपास सर्जरी के साथ बच्चादानी, मूत्राशय, अंडकोष की सर्जरी निशुल्क होगी स्क्रीन के तहत लापरवाह चिकित्सकों और अस्पतालों को सिस्टम बना देता क्यों है। बड़ी संख्या में डॉक्टर स्वयं या फिर उनकी पत्नियों किसी न किसी राजनीतिक दल से संबद्ध है। हर मौके पर जिले भर के कलेक्टर को टी शर्ट पहने चल देती है तो सिस्टम भी पहने हुए कपड़ों की कीमत चुकदा करने को तैयार रहता है। आखिर हम कब तक इस सड़े हुए सिस्टम में प्रेस स्वतंत्रता की या किसी भी दिवस की बधाई दे सकेंगे।