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24hnbc एफआईआर काउंटर एफआईआर से बड़ा मसला है पीएफ का न जमा होना, और पुस्तकों का कमीशन खाना
Friday, 04 Jul 2025 18:00 pm
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बिलासपुर, 5 जुलाई 2025। 
                पत्रकारवार्ता कब करनी है ये किसी व्यक्ति का निजी अधिकार है। पर किसी संस्था का बड़ा अधिकारी जब पत्रकारवार्ता करता है तो पत्रकारवार्ता का समय और उसका औचित्य भी चर्चा का विषय बन जाता है। जैसे 4 जुलाई के दिन प्रदेश की राजधानी रायपुर के प्रेस क्लब में छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ़ एजुकेशन के उन पदाधिकारीयों ने पत्रकारवार्ता की जिनके विरुद्ध 19 जून को सिविल लाईन थाना रायपुर में इसी बात की एफआईआर दर्ज है कि वे वैधानिक पदाधिकारी नहीं है। एफआईआर करने वाले और जिन पर एफआईआर हुई है दोनों एक दूसरे को अवैधानिक कहते हैं।
हमारी चर्चा कुछ अलग है लगभग 1 साल पूर्व प्रदेश का मसीही समाज का सबसे बड़ा अस्पताल की लीज बिलासपुर कलेक्टर ने निरस्त कर दी और संभाग आयुक्त की कोर्ट से सरकार के पक्ष में आदेश आते ही जिला प्रशासन, नगर पालिका निगम बिलासपुर ने मिशन अस्पताल का भवन गिरा दिया जब तक हाई कोर्ट बिलासपुर से कोई स्थगन मिलता भवन का 80% गिराया जा चुका था। आयुक्त न्यायालय से जो केस जिला प्रशासन के पक्ष में गया मसीही समाज हारा वह आवेदन पत्र नितिन लॉरेंस ने ही प्रस्तुत किया था। वे मिशन अस्पताल के केस को लगातार हार रहे हैं और अभी मामला उच्च न्यायालय में लंबित है। पर इस मामले में महोदय ने कभी भी ना तो स्वयं ना अपनी समिति के साथ पत्रकारवार्ता की ना बिलासपुर में और ना ही रायपुर में। मिशन अस्पताल का भवन गिर गया वह व्यक्तिगत मामला नहीं था यह मसीही समाज की सेवा का प्रतीक था और पूरे शहर के लिए विचारणीय विषय था। सीडीबीई के पदाधिकारीयों के खिलाफ एफआईआर का शिकायती पत्र 2024 में सिविल लाइन थाना में प्रस्तुत हुआ लंबी जांच के बाद 2025 में एफआईआर हुई, और एफआईआर के पूर्व जांच वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के द्वारा की गई।
 मसीही समाज के स्कूलों का असल मसला एफआईआर से कहीं ज्यादा बड़ा है। शिक्षकों को वेतन समय पर न मिलाना, पीएफ की धनराशि जमा न होना, छात्राओं को निशुल्क मिलने वाले सेनेटरी पैड का ₹10 वसूल लेना, निजी प्रकाशकों की किताब चलाना, कंप्यूटर साइंस की किताब की कीमत 890 वसुलना सीडीबीई के कथित पदाधिकारी ऊपर वाले का धन्यवाद दे की वे छत्तीसगढ़ में है कहीं उनके स्कूल जबलपुर में होते या जबलपुर के कलेक्टर बिलासपुर/रायपुर के होते तो अभी तक जेल की हवा खा रहे होते। अजय उमेश जेम्स जिनके विरुद्ध रायपुर में एफआईआर हुई है अधिक फी, पुस्तक कमिशन इन दो आरोपों में 3 माह से अधिक जेल में रहे हैं।
*जब मिशन अस्पताल पर बुलडोज़र चला , तब बिशप जन्मदिन मनाने में व्यस्त थे अब अपराधियों को बचाने प्रेस कॉम्फ्रेंस*
 इसे विडंबना कहें या दुर्भाग्य, लेकिन जब शहर के ऐतिहासिक मिशन अस्पताल की इमारत पर बुलडोज़र चल रहा था, तब बिशप महोदय अपने जन्मदिन का जश्न मना रहे थे। मसीही समाज के बीच इस घटनाक्रम ने गहरी नाराजगी और आहत भावनाएं पैदा कर दी हैं।
बिलासपुर के मिशन अस्पताल को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा था। लेकिन जब उसका अंत इस तरह हुआ, तो आशा की जा रही थी कि चर्च प्रशासन और बिशप का कार्यालय इसे गंभीरता से लेगा और खुलकर अपनी बात रखेगा। लेकिन अफसोस की बात यह रही कि बिशप कार्यालय की ओर से न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई और न ही कोई प्रेस रिलीज़ जारी हुआ।
अब जबकि बिशप कार्यालय खुद विवादों में घिरा हुआ है — उनके सचिव और अध्यक्ष पर सीधे सवाल उठ रहे हैं — तब बिशप साहब सामने आकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, वो भी कथित अपराधियों के बचाव में।
मिशन अस्पताल का मसला सिर्फ एक संपत्ति विवाद नहीं था, यह मसीही समुदाय की सेवा और इतिहास से जुड़ा था। लेकिन जिस प्रकार से बिशप कार्यालय ने इसे नजरअंदाज किया और फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी धारकों को सामने लाकर मामला कमजोर किया, उससे समुदाय के भीतर यह भावना गहरी हो गई है कि संस्था अब निहित स्वार्थों की गिरफ्त में है।
मसीही समाज का आरोप है कि बिशप कार्यालय ने इस पूरे मामले में अत्यंत उदासीनता दिखाई। अस्पताल की रक्षा हेतु जहां संघर्ष की आवश्यकता थी, वहाँ कार्यालय ने कथित फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी धारकों को आगे कर दिया, जिससे मामला बार-बार न्यायालय में कमजोर हुआ और अंततः रायता फैल गया।
मसीही समुदाय के कुछ वर्गों का तो यह भी आरोप है कि चर्च प्रशासन के कुछ सदस्यों के RSS से ‘मधुर संबंध’ हो सकते हैं, जिनका लाभ उठाकर मिशन अस्पताल को बलि चढ़ाया गया।
अब सवाल उठता है — क्या बिशप का कार्यालय मसीही समाज के लिए काम कर रहा है या फिर केवल एक सीमित गुट के निजी हितों की रक्षा कर रहा है?
समय की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और मसीही समाज को यह भरोसा दिलाया जाए कि उनकी आस्था, सेवा और विरासत को यूँ ही मिटने नहीं दिया जाय ।