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24hnbc सरकार के खिलाफ किसी भी आवाज को बदनाम करने की नपीतुली भाजपाई रणनीति
Tuesday, 08 Dec 2020 00:00 am
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मोदी सरकार पर सवाल उठाने वाले आंदोलनों को बदनाम करने की कड़ी में भाजपा की प्रोपगेंडा टीम का हालिया निशाना दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे किसान है.हो सकता है, अब उन्हें भाजपा की प्रोपगेंड टीद्वारापूर्व में अन्य जन आंदोलनों और कार्यकर्ता पर ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग,’ ‘जिन्ना की औलाद’ से लेकर ‘अर्बन नक्सल’ होने के जो आरोप लगाए गए थे, उनकी सच्चाई ज्यादा नजदीक से समझ आए.भाजपा कीप्रोपगेंडाटम का यह आजमाया हुआ तरीका है. सोशल मीडिया के दौर में यह और भी आसान हो गया है. इसमें मुद्दे का जवाब देने और लोगों की बात सुनने की बजाय आंदोलन करने वालों या मोदी सरकार पर उंगली उठाने वालों पर तमाम तरह के आरोप लगाकर उन्हें बदनाम कर दिया जाता है.एक बार इसे शुरू कर दिया, तो बाकी काम उनकी साथी मीडिया संभाल लेती है. लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है.एक तरफ किसानों की ताकत के आगे झुककर मोदी सरकार ने उनसे बात तो शुरू कर दी है, लेकिन दूसरी तरफ उसके प्रोपगेंडा सेल ने उन्हें बदनाम करने का अभियान शुरू कर दिया है.इसमें किसानो के आंदोलन को खालिस्तानी करार दिए जाने से लेकर, इस पर माओवादी और असामाजिक तत्वों या मोदी विरोधियों द्वारा कब्जे में कर लिए जाने के आरोप लगना शुरू हो गए है.इतना ही नहीं, वो किसानों से जुड़े छोटे व्यापारियों को किसानों का शोषण करने वाला बिचौलिया बता रही है और किसानों के आंदोलन को इन व्यापारियों द्वारा प्रायोजित बता रही है.इसमें भाजपा की आईटी सेल से लेकर उनके छोटे-बड़े नेता और कई तरह के लोग लगे हुए हैं. इसमें उनका भोंपू या साथी मीडिया कहें तो बेहतर होगा, भी शामिल हो गया है.इस तरह के आरोप लगाने की शुरुआत मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्रों को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ करार देकर की गई थी.उस समय मीडिया के जरिये पूरे देश में यह भ्रम फैलाया गया कि जेएनयू के छात्र वहां पढ़ने की बजाय देश विरोधी गतिविधियों में लगे हैं और उन्होंने एक सभा कर उसमें ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगाए.कमाल की बात है कि दिल्ली पुलिस और तमाम एजेंसियां केंद्र की भाजपा सरकार के पास होने के बावजूद आज तक वो इस मामले में कुछ भी साबित नहीं कर पाई है.लेकिन आज भी भाजपा के प्रवक्ता मीडिया डिबेट के दौरान और अपने भाषणों में इन आरोपों को पूरे जोर-शोर से दोहराते नजर आएंगे. इतना ही नहीं, उनका साथी मीडिया भी इसे समय-समय पर दोहराता रहता है.इसके बाद गोमांस के नाम पर मुसलमानों और दलितों की सरेआम हत्या की गई और जय-श्रीराम का नारा एक राजनीतिक नारा बन गया. जो इसके खिलाफ बोलने लगे उन्हें ‘हिंदू विरोधी’ कहा जाने लगा.फिर जो सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी आदिवासी और दलित हित में बोलते और कॉरपोरेट के खिलाफ आवाज उठाते हैं, उन्हें ‘अर्बन नक्सल’ कहने लगे.