24hnbc साव का बतौर प्रदेश अध्यक्ष हुआ 1 साल, सांसद/प्रदेश अध्यक्ष दोनों भूमिका में गायब है प्रखरता
Monday, 07 Aug 2023 18:00 pm
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बिलासपुर, 8 अगस्त 2023।
विधानसभा चुनाव के शेष 3 महीने पूर्व भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव का 1 वर्ष आज पूरा हो रहा है। अनुशासित कही जाने वाली भाजपा 1 साल में पूर्व के मुकाबले गुटबाजी में ज्यादा बटी नजर आ रही है। ठीक 1 साल पहले जब बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद अरुण साव को हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष बनाया तब भाजपा में 3 गुट थे अब चार हो गए। उनके अध्यक्ष बनते समय प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी थी अचानक एक कार्यक्रम के दौरान नए प्रदेश प्रभारी ओम माथुर का नियुक्ति पत्र आ गया ऐसा लगा हाई कमान को अपने ही नेताओं पर भरोसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में ओबीसी पॉलिटिक्स का दबाव दिल्ली में इस कदर छा गया है कि उसे उबर पाना संभव नहीं दिख रहा है। जानकार बताते हैं कि भले ही प्रदेश अध्यक्ष ओबीसी वर्ग से आते हैं पर ओबीसी वर्ग से जिस साहू समाज का सर्वाधिक मतदाता है उस वर्ग का होने के लिए प्रदेश अध्यक्ष को दुर्ग के पूर्व भाजपा सांसद के पुत्र से मदद लेनी पड़ी। ऐसा नहीं है कि विधानसभा चुनाव पूर्व के साल में जब भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश में आंदोलनो की जरूरत थी प्रदेश अध्यक्ष ने नहीं किये उन्होंने सड़क पर भी आंदोलन किया और जो आंदोलन चल रहे थे उन्हें जाकर समर्थन भी दिया पर उच्च शिक्षित वर्ग से आने के बावजूद उन्हें छत्तीसगढ़ का मध्यम वर्ग अपना नहीं मानता इस वर्ग के बीच उनकी लोकप्रियता दूर-दूर तक नहीं है और ओबीसी वर्ग में जिस मतदाता वर्ग का वह प्रतिनिधित्व करते हैं वह वर्ग भी दूरी बनाता है। बताया जाता है कि कार्यकर्ताओं से प्रदेश अध्यक्ष का संवाद वैसा नहीं है जैसा चुनावी वर्ष में हो जाना चाहिए भाजपा की अंदरूनी जानकारी रखने वाले बताते हैं कि पार्टी में बदनाम चेहरे जिनके कारण सट्टा गई आज भी उनका बोलबाला है लिहाजा नए चेहरे प्राथमिकता नहीं पा रहे हैं। 1 साल के भीतर छत्तीसगढ़ में मौके पर चौका मारने वाले कुछ ऐसे कांड हुए जिन्हें अवसर में बदलना जरूरी था पर नहीं हो पाया इसे प्रदेश अध्यक्ष की नाकामी ही कहेंगे। कहा जाता था कि वे बिलासपुर के पूर्व विधायक टीम के खास हैं इस चुनावी वर्ष में प्रदेश स्तर पर बिलासपुर के हारे हुए विधायक नेता को भरपूर तवज्जो मिल रही है उस तवज्जो के सामने प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका पिछड़ती नजर आ रही है। जब प्रदेश अध्यक्ष के रूप में बिलासपुर संसद का नाम घोषित हुआ तब राजनीति के कच्चे जानकर उन्हें प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बताते थे पर अब इसकी संभावना नगण्य है वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा छत्तीसगढ़ में किसी चेहरे को आगे रखकर चुनाव में उतारने का जोखिम लेना नहीं चाहती और तीन अन्य राज्यों के समान छत्तीसगढ़ की पूरी जिम्मेदारी दीशा के कंधों पर है।