24hnbc बिलासपुर के सुपर कॉप और गंगाजल कार्य प्रणाली
Monday, 12 Jun 2023 18:00 pm
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बिलासपुर, 13 जून 2023। गंगाजल-2 कि बात नहीं करते गंगाजल देखें कैसे पिक्चर के पुलिस अधीक्षक को एक टी आई की कार्यशैली संदिग्ध जान पड़ती है वह पूछता है कुछ मामलों में शानदार रिजल्ट और कुछ फाइल ढंग काम किसके लिए कर रहे हो तुम.... इसी के बाद उस थानेदार का जमीर जाग उठता है और उसे खाकी के साथ ली हुई शपथ याद आती है। शायद बिलासपुर के कुछ थाने इसी दौर से गुजर रहे हैं। कुछ मामलों में तत्काल गिरफ्तारी थाना एक्शन में पता चलता है कि मामला साधारण छेड़खानी का था। और कुछ मामलों में पुलिस का तत्काल एक्शन गो स्लो में तब्दील हो जाता है या गो स्लो इतना स्लो होता है कि पुलिस के गतिमान होने पर ही शक होता है। फिर ऐसे मामले विशेष कर 307 और फ्रॉड के होते हैं यहां पर माना जा सकता है कि फ्रॉड के मामले में जांच अती तकनीकी होती है, पर 307, 302 के मामले तो त्वरित निपटने ही चाहिए। अब तो पुलिस की कार्यप्रणाली सीबीआई के समान हो गई है जहां पर मामला कितना भी संवेदनशील हो पूरी जांच के साथ आरोपी को चालान प्रस्तुत करने के दिन कोर्ट में प्रस्तुत कर दिया जाता है फिर न्यायालय चाहे तो आरोपी को जमानत दे दे या जेल भेज दे। पर बिलासपुर में तो कार्यप्रणाली कुछ और ही चल रही है फरारी में चालान प्रस्तुत करना उपस्थित किए गए आरोपियों के खिलाफ चार्ज फ्रेम हो जाता है प्रकरण प्रारंभ हो जाता है जो फरार है उसके खिलाफ स्थाई वारंट हो जाता है और यही प्रक्रिया है। देखते देखते गवाही गुजर जाती है यदि उभय पक्षों के बीच कोर्ट के बाहर समझौता हो गया तो फरार आरोपी कोर्ट में सिलेंडर कर देता है यदि समझौता नहीं हुआ तो आरोपी इंतजार करता है प्रकरण के फैसले का..... ऐसे में यदि अन्य आरोपी कोर्ट से छूट गए तो फरार आरोपी के लिए आसान हो जाता है, वह उपस्थित हो जाता है और उसे मालूम होता है कि इस प्रकरण में सजा की गुंजाइश बहुत कम है। आरोपी के लगातार फरार होने सामाजिक प्रभाव यह होता है कि उसकी गुंडागर्दी का दबदबा और बढ़ जाता है और अपराध को जिसने आय का जरिया बना लिया है उनके लिए यह कार्यप्रणाली हो गई है। फरार आरोपियों की दहशत उनके कमांडर मोबाइल पर कांफ्रेंस के साथ दबदबे को और बढ़ाते हैं। वसीम खान के मामले में यही हो रहा है एक और वह फरार है दूसरी ओर सट्टे की डूबी हुई रकम को वसूल करने में उसका दबदबा काम आता है यह पूरी कहानी मुंबईया फिल्मी स्टाइल की है और कहा जाता है कि ऐसा बगैर स्थानीय राजनीतिक संरक्षण के नहीं हो सकता।