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24hnbc प्रदेश में ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को मिला नंद का साया
Sunday, 30 Apr 2023 18:00 pm
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समाचार -
बिलासपुर, 1 मई 2023। सन 1997 से 2000 तक मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार साय आज कांग्रेस में प्रवेश कर गए। वे मध्य प्रदेश से कटकर 2001 में बने छत्तीसगढ़ के प्रथम नेता प्रतिपक्ष थे। 2003 के छत्तीसगढ़ के प्रथम विधानसभा चुनाव में उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री अजीत जोगी को मरवाही में चुनौती दी थी, यह बात अलग है कि साय जोगी से हार गए थे पर नंदकुमार साय की यह रणनीति कारगर रही की जोगी को उनके गृह ग्राम में मुकाबला दिया जाए जिससे जोगी पूरे राज्य में बेफिक्री से चुनाव प्रचार न कर सके नंद कुमार की यह रणनीति काम कर गई। जोगी जी भले ही मरवाही से चुनाव जीते पर कांग्रेस छत्तीसगढ़ में सरकार गवा बैठी। उन दिनों छत्तीसगढ़ में आदिवासी एक्सप्रेस की बहुत चर्चा होती थी आम जनता को ऐसी उम्मीद थी कि नंदकुमार साय भले ही विधानसभा चुनाव हार गए हो पर उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ, और छत्तीसगढ़ में भाजपा की इस कूटनीति के चलते आदिवासी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई। नंदकुमार साय मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ के वरिष्ठतम जनप्रतिनिधि हैं। उन्होंने पहला विधानसभा चुनाव 1977 में तकरार विधानसभा से लड़ा। 80 में रायगढ़ नगर पंचायत के अध्यक्ष रहे 85 में फिर तकरार से विधायक चुने गए। 1979, 1996 और 2004 में रायगढ़ से सांसद रहे। 2009 में राज्यसभा भेजे गए, इस तरह वह छत्तीसगढ़ में वरिष्ठतम नेता की श्रेणी में आते हैं इतना ही नहीं वह राष्ट्रीय जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रहे। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के निधन के बाद कांग्रेस में आदिवासी नेता की जो कमी है नंदकुमार साय कांग्रेस प्रवेश से वह समाप्त हो जाती है इतना ही नहीं प्रदेश कांग्रेस में भूपेश बघेल गुट के सामने अन्य कोई राजनीतिक ध्रुवीकरण दिखाई नहीं देता चरणदास महंत विधानसभा अध्यक्ष हैं लिहाजा उनका अपना कोई गुट नहीं है। छत्तीसगढ़ में दूसरे नंबर के नेता टी एस सिंह देव जिस तरह से इन दिनों राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं उससे कांग्रेस का आलाकमान सतर्क है । प्रदेश कांग्रेस में आदिवासी सीटों को जीतने के लिए इसी आदिवासी नेता का पार्टी में होना अत्यंत आवश्यक है। मोहन मरकाम के नेतृत्व में वह क्षमता नहीं कि बस्तर से जसपुर तक आदिवासियों को बांध सकें उनके मुकाबले नंदकुमार साय ऐसा बड़ा आदिवासी चेहरा है जो छत्तीसगढ़ ही नहीं मध्य प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा और महाराष्ट्र तक प्रभाव कारी हो सकता है। इसके लिए कांग्रेस के आलाकमान को यह देखना होगा कि नंदकुमार साय के भीतर की संगठनात्मक क्षमता को कांग्रेस की गुट बाजी रोके नहीं। आज जिस तरह से राहुल गांधी आदिवासी मजदूर की आवाज बनकर पूरे भारत में सड़क नाप रहे हैं आम आदमी से सीधा संवाद कर रहे हैं वैसी ही क्षमता नंदकुमार साय की है। घमंड उन्हें छूता नहीं है पत्रकारों के प्रश्नों का लंबा जवाब देना, अपने जवाब को तार्किक क्षमता के साथ देना, जुमलेबाजी से दूर रहना सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता रखना यह नंदकुमार साय की पहचान है और वह जितना आदिवासी धर्म, कला, संस्कृति को समझते हैं उतनी ही गंभीरता से उन्हें सनातन धर्म का ज्ञान है। संस्कृत और संस्कृति के वे बड़े जानकार हैं। 
नंदकुमार साय के भाजपा छोड़ देने से सबसे पहले ओम माथुर की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह लगता है इसके पहले पुरंदेश्वरी प्रदेश प्रभारी थी पर उनके छोटे कार्यकाल में भी कोई नेता भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में नहीं गया था भाजपाई यह कहते नहीं थकते की ओम माथुर को जहां-जहां का प्रभार मिला उन्होंने वहां वहां भाजपा की सरकार बनवाई ऐसे में जब ओम माथुर जैसे कुशल संगठक प्रदेश भाजपा को देख रहे थे तो अअनुभवी साय ने भाजपा कैसे छोड़ दिया... ? इसके अलावा ओबीसी पर जरूरत से ज्यादा भरोसा आदिवासी की उपेक्षा तक हो रहा है ऐसे में भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेताओं को ही जब अपना अस्तित्व संकट में दिखे तब इस वर्ग का मतदाता भाजपा को क्यों वोट दें। भाजपा ने पहले अपने प्रदेश अध्यक्ष जो एसटी वर्ग से आता था उसे हटाया फिर ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष बनाया ओबीसी वर्ग के नेता प्रतिपक्ष को हटाकर ओबीसी वर्ग के ही विधायक नारायण चंदेल को नेता प्रतिपक्ष बनाया इससे आदिवासी मतदाता वर्ग और आदिवासी नेता दोनों नाराज हुए पर इन दिनों आदिवासी प्रधान छत्तीसगढ़ राज्य में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ओबीसी के फेर में फंसी है नंदकुमार साय के पार्टी छोड़कर चले जाने के बाद भी भाजपा के नेता जगने वाले नहीं हैं ऐसे में प्रदेश की आदिवासी सीट पर जीतने के लिए भाजपा के पास कोई सटीक रणनीति नहीं है इसका खामियाजा उन्हें 6 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ेगा।