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नियम और नियत का खेल सब मोदी नहीं होते ओबीसी, वैसे ही सब वानखेड़े नहीं होते मुसलमान
Friday, 24 Mar 2023 18:00 pm
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समाचार -
बिलासपुर, 25 मार्च 2023। हम जाति की राजनीति पर कुछ कहना पसंद नहीं करते तभी तो हमें यह बात बहुत बाद में पता चली कि सरदार बल्लभ भाई पटेल कुर्मी थे और गुजराती थे। हम तो उन्हें पूरे देश का मानते थे पर इन दिनों नेताओं को खाचे में डालना स्वयं पसंद है। और सुविधा अनुसार वे अपना खाचा बदलते रहते हैं इसलिए इस सरनेम का जिक्र करना बहुत जरूरी है मोदी जाति नहीं है समूह नहीं है असल में यह है एक व्यापारी वर्ग और यह सरनेम मोदी केवल गुजरात में ही नहीं पाया जाता। अन्य स्थानों पर भी होता है भारतीय संसद में अपनी बहस के लिए पीलू मोदी एक बड़ा नाम था जो कि पारसी थे, उत्तर प्रदेश का नामचीन बैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी मुसलमान थे, ललित मोदी जो आईपीएल के बड़े घोटालेबाज हैं मारवाड़ी हैं राजस्थान से आते हैं, एक और उदाहरण महाराष्ट्रीय वानखेड़े कभी दलित भी होते हैं और कभी मुसलमान भी होते हैं सरनेम देखकर यह नहीं बताया जा सकता कि उसकी जाति क्या है। अब मूल मुद्दा पैदल तो राहुल गांधी चल रहे थे पसीना बीजेपी के माथे पर आ रहा था और यह पसीना संसद में नहीं देखना था तो 22 फरवरी से 23 मार्च के बीच पूरा खेल कर लिया गया असल में लोकतंत्र चेक एंड बैलेंस का खेल है हमारे संविधान निर्माता इस संतुलन को बना कर गए। तीनों खंभों के बीच एक भी खंभा अतिरिक्त मजबूत ना हो यदि होता है तो नुकसान होता है 2013 में उच्च न्यायालय ने एक व्यवस्था दी कभी भी किसी भी प्रकरण में यदि निर्वाचित जनप्रतिनिधि को 2 साल या उससे अधिक की सजा होगी तो उसकी सदस्यता तुरंत प्रभाव से समाप्त हो जाएगी यह आदेश आने के बाद से ही मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के सदस्यों को समझ आ गया था कि सजा देना ट्रायल कोर्ट का काम है और सजा मजिस्ट्रेट से लेकर सत्र न्यायाधीश तक देता है और यही न्यायपालिका का वह पायदान है जो समीकरण बन जाता है। तभी उन्होंने एक अध्यादेश की तैयारी की थी उस समय कांग्रेस के सांसद युवा तुर्क राहुल गांधी को लगा कि मनमोहन सिंह का मंत्रिमंडल भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए यह अध्यादेश ला रहा है उन्हें यह चीज पता ही नहीं थी कि भ्रष्टाचार के मामलों में सजा होने में सालों लगते हैं पर ऐसे कई प्रकरण हैं और कई धाराएं हैं जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को बहुत कम समय सीमा के भीतर 2 साल की सजा ठोकी जा सकती है । और ऐसे प्रकरण जेएमएफसी प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की कोर्ट में आसानी से निपटाया जा सकता है। शो उस समय की गलती अब विपक्ष के कई नेताओं को भुगतनी पड़ रही है। असल में नियम और नियत अक्षरों का खेल है असीम शक्ति किसी एक पद के भीतर किसने दी असीम शक्ति होते हुए भी कुछ व्यक्ति नियम और नियत के बीच संतुलन बनाकर चलते हैं और कुछ की नियत ऐसी गड़बड़ आती है कि वह नियमों का भरपूर उल्लंघन करते हैं। इससे लोकतंत्र और जनतंत्र में नई संभावनाएं विकसित होती है।