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24hnbc छत्तीसगढ़ में सही नहीं बैठेगा भाजपा का यह फार्मूला
Thursday, 15 Dec 2022 18:00 pm
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समाचार -
बिलासपुर, 16 दिसंबर 2022। इन दिनों छत्तीसगढ़ में चुनाव विमर्श के दो फार्मूले चर्चा में आ रहे हैं। भाजपा गुजरात फार्मूले की बात करती है तो कांग्रेस पूरे देश का चुनाव छत्तीसगढ़ मॉडल से लड़ने की बात करती है। पहले भाजपा की चर्चा, कांग्रेस की चर्चा और उसकी रणनीति पर बात बाद में करेंगे। 
2001 में जब छत्तीसगढ़ बना तो चुनाव के लिए उसकी अपनी कोई विशेष नीति नहीं होती थी। पहला चुनाव 2003 में हुआ और उस समय के जानकार जीने ने चुनाव को कवर किया प्रशासनिक गोलबंदी को देखा वे दो बातें समझे मैदानी क्षेत्र में कांग्रेस का खेल एनसीपी के वी सी शुक्ला ने बिगाड़ा और भाजपा ने अपना खेल बस्तर में पैरामिलिट्री फोर्स से बनाया। चुनाव परिणाम के बाद उस समय के मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने सत्ता बनाए रखने के लिए जो कुछ किया वह सब कुछ इन दिनों भाजपा करती है। इस तरह से छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र का दूषित होना 2003 से ही प्रारंभ हो गया था। लगातार तीन चुनाव भारतीय जनता पार्टी जीतती चली गई । 2003 में जिस रमन सिंह को लखी की गाय कहा जाता था वह कैसे नाना से लेकर हेलीकॉप्टर दिल तक में बदनाम हुआ सब ने देखा। 15 साल उनके शासन के दौरान कितने कांड हुए छत्तीसगढ़ की जनता ऐसे कांड से ना केवल ऊबी बल्कि चिड़ भी गई परिणाम जब अमित शाह जी ने अबकी बार 80 पाठ का नारा दिया तो जनता ने धोबी पछाड़ मारते हुए भाजपा को 14 पर पटक के मारा और भाजपा उस धोबी पछाड़ से अब तक नहीं उबर पाई। जिन लोगों को ऐसा लगता है कि पूरे जीते हुए भाजपाई विधायकों का टिकट बदल देने से भाजपा फिर से सत्ता में आ जाएगी वे सिरे से गलत है, क्योंकि यह फार्मूला तब चलता है जब आप सत्ता में होते हो विपक्ष में रहते हुए यह फार्मूला लागू नहीं किया जा सकता। हम बिलासपुर की ही बात करें बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र में भाजपा का 20 साल एक तरफा राज रहा, मध्य प्रदेश से अलग होते समय भी बिलासपुर में भाजपा का महापौर था और बहुमत भी उन्हीं के पक्ष में था। सरकार बनने के बाद तो भाजपा का महापौर बनना केवल सहयोग नहीं कहा जा सकता। प्रत्यक्ष मतदान प्रणाली से जीता हुआ अंतिम महापौर किशोर राय जी थे और उस चुनाव को उन्होंने विधायक अमर अग्रवाल के चुनाव से भी बढ़कर जीता था। वे बिलासपुर के सर्वाधिक मतों से जीते महापौर थे। विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने एक नए चेहरे को टिकट दिया टिकट पाने वाले का नाम शैलेश पांडे था और उन्होंने कद्दावर मंत्री अमर अग्रवाल को धूल चटा दी, जबकि उन्हें कांग्रेस के स्थापित नेताओं की मदद नहीं मिली थी जो अब भी नहीं मिलती है। अगर रणनीति के अनुसार भाजपा अपने सभी विधायकों का टिकट काटने जा रही है तो हारे हुए प्रत्याशी को टिकट चना देना भी एक फार्मूला रहेगा जब जीते हुए को नहीं देंगे तो हारे हुए को कैसे देंगे. . . . . ? लेकिन 4 साल के दौरान बिलासपुर जिले के भीतर ही सेकंड लाइन के कितने नेता भाजपा ने आगे बढ़ाएं तो जवाब शून्य आता है। असल में भाजपा का फार्मूला या रणनीति एक ही है चुनाव में मोदी जी का चेहरा दिखा कर जनता को लूभाओ कभी चौकीदार के नाम पर, कभी चाय के नाम पर, कभी पुलवामा के नाम पर तो इस बार समान नागरिक संहिता के नाम पर जनता के असली मुद्दे पर चुनाव न लड़ना भाजपा का खेल है यदि जनता मतदान करने जाएगी और अपने मुद्दों पर मतदान करेगी तो न कमल चुनाव चिन्ह काम आएगा ना ही पीएम का चेहरा. ....।