24hnbc हम अपने इतिहास को भूले... शहर जिंदा कैसे रहेगा श्री राघवेंद्र राव पर विशेष
Wednesday, 03 Aug 2022 18:00 pm
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर शहर की छत्तीसगढ़ राज्य में और भारत देश में क्या पहचान है। अभी 2022 चल रहा है, इस शहर में उच्च न्यायालय है एक दो तीन विश्वविद्यालय हैं के बावजूद हम हमारे काबिल जनप्रतिनिधि अपने शहर के स्वर्णिम इतिहास को अपने ही समकालीन के सामने नहीं रख पा रहे हैं। आज 4 अगस्त 2022 है इसी माह आजादी पर्व 15 अगस्त मनाया जाएगा। अमृत महोत्सव के रूप में 4 अगस्त पर हम जोर क्यों दे रहे हैं इसी तारीख में 1889 को शहर के प्रतिष्ठित राव परिवार में ई राघवेंद्र राव का जन्म हुआ यह वह नाम है जिसने बिलासपुर से लंदन तक की यात्रा की और भारत के सचिव के सलाहकार बनकर बिलासपुर का नाम प्रशासन के इतिहास में दर्ज करा दीया। कुछ लोगों को कटु लग सकता है, पर यह कहने में कोई संकोच नहीं कि पहले मध्य प्रांत, फिर मध्य प्रदेश और अब छत्तीसगढ़ में श्री राघवेंद्र राव के कार्यों को याद ना करके जो गलती की जा रही है उसे से स्थानीय जनप्रतिनिधि सभा का नुकसान हो रहा है। भारत में स्थानीय शासन प्रणाली लोक प्रशासन के जनक थे श्री राव यह कहने का पर्याप्त आधार है उस वक्त के बिलासपुर में जितनी शिक्षा ग्रहण की जा सकती थी लेने के बाद उन्होंने इलाहाबाद का रुख किया। फिर नागपुर और बार एक्ट ला की पढ़ाई के लिए 1909 में इंग्लैंड लंदन गए। अध्ययन के बाद 1914 में बिलासपुर वापस आए 1916 में नगर पालिका का गठन हुआ अध्यक्ष उपाध्यक्ष के चुनाव के लिए 8 माई 1916 को टाउन हॉल में बैठक हुई शासन की ओर से अध्यक्ष पद के लिए डी जी गाडगिल और सामान्य जनता की ओर से ई राघवेंद्र राव का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित हुआ। मतदान पश्चात श्री राव को 11 और गाडगिल को 3 मत मिले उपाध्यक्ष पद के चुनाव में त्रिंबक राव हेडनक ने गाडगिल को परास्त किया। आज यह कल्पना करें सत्ता के खिलाफ स्थानीय चुनाव जीतना कितना कठिन है 1916 में शासन अंग्रेज का और उसके प्रशासनिक के मुखिया द्वारा उतारे गए व्यक्ति के विरुद्ध में चुनाव में उतरना जीतना फिर शहर के नागरिकों को एक बेहतर प्रशासन प्रदान करना श्री राव 1927 तक अध्यक्ष रहे, क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी की संगठनात्मक गतिविधि शुरू करने का गौरव भी श्री राव को जाता है । 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का अधिवेशन लखनऊ में हुआ। श्री राव इस अधिवेशन में शामिल हुए और विषयनियात्मक कमेटी तथा ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी चुने गए वापस सी के बाद श्री राव ने बिलासपुर में जिला कांग्रेस कमेटी का संगठन खड़ा किया और पार्टी के कार्य को सुचारू रूप से संचालित किया 1921 में भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गए और 23 तक रहे इसी बीच बिलासपुर में प्रांतीय राजनैतिक सम्मेलन हुआ। इसमें पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान बिलासपुर पधारे। सम्मेलन स्थल पर दिए गए भाषण के कारण पंडित माखनलाल चतुर्वेदी को सजा हुई वह 8 माह बिलासपुर जेल में रहे। यहां उस कविता का सृजन हुआ जिसे हम "मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेक" के रूप में गाते हैं। नगर पालिका अध्यक्ष का पद फिर पार्टी की जिम्मेदारी से यह पता चलता है कि श्री राव लोक प्रशासन के सिद्धांत गढ़ रहे थे साथ में राजनीतिक दल का संचालन भी जिस कुशलता से कर रहे थे व उनके नेतृत्व क्षमता को परिभाषित करता है। 1926- 1927 मध्य प्रांत की राजनीति और प्रशासन का यू-टर्न है मध्य प्रांत की विधान परिषद चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। श्री राव ने अंध विरोध के स्थान पर अनु क्रियाशील संयोग का रास्ता पकड़ा 31 सदस्यों ने मिलकर राष्ट्रीय दल बनाया और संयुक्त दल के नेता श्री राव बने। 12 जनवरी 1927 में मंत्री बने फिर 38 वर्ष की आयु में प्रांत के मुख्यमंत्री बने तथा 1930 तक रहे उस समय उन्होंने किसान ऋण माफी की और 8 करोड रुपए का कर्ज माफ हुआ मध्य प्रांत में सबसे पहले नागपुर में उच्च न्यायालय की स्थापना में श्री राव का विशेष स्थान है। शिक्षा विभाग उन्होंने अपने पास रखा फलतः नागपुर में महिला महाविद्यालय की स्थापना हुई। आज हम सब पुलिस रिफार्म की बात करते हैं राव उस वक्त गृह सदस्य थे उन्होंने पुलिस मैनुअल में संशोधन का बड़ा कदम उठाया दो पुलिस प्रशिक्षण शाला में स्थापित कराई सागर के पुलिस विद्यालय को महाविद्यालय में तब्दील किया रायपुर में पुलिस लाइन के भवन का पुनः निर्माण कराया। नागपुर में पुलिस बल के लिए निवास स्थल का निर्माण कराया। उस समय उन्होंने जो भी जिम्मेदारी संभाली उस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी आज क्या कारण है कि बिलासपुर में भी उनकी स्मृति को सहेज कर नहीं रखा जा रहा है। लोक प्रशासन, गृह, आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में शैक्षणिक स्तर पर यह सामग्री क्यों पाठ्यक्रम में शामिल नहीं की जाती नगर पालिक निगम का अपना शिक्षा विभाग है संस्कृति विभाग है क्या निर्वाचित जनप्रतिनिधि वहां इस विषय पर कुछ नहीं कर सकते अब तो निगम का अपना ग्रंथालय है वही उस वक्त के राजनैतिक समाज, कानून, अंग्रेजी हिंदी के पत्राचार का संकलन रखा जाए यह सब जरूरी है ना होने पर बिलासपुर शहर कांकरिट का शहर तो बन जाएगा पर उसमें आत्मा नहीं होगी तो संस्कार मूल्य दर्शन सौंदर्य भी नहीं होगा और ऐसा हुआ तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।