24hnbc समझे आस्तिक व नास्तिक को कौन देश को चाहता है बांटना
Tuesday, 04 Jan 2022 18:00 pm
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर । देश में इन दिनों एक सुनियोजित साजिश के तहत विचारधारा विशेष के द्वारा हिंदू राष्ट्र के लिए महात्मा गांधी के खिलाफ अपशब्द कहे जा रहे हैं। इन मामलों में एक व्यक्ति विशेष को अपशब्द कहने के साथ ही देश के संविधान को बदल देने की भी बात कही जाती है असल में हमारा संविधान लोकतांत्रिक तरीके से उत्तरदायित्व निश्चित करता हुआ देश को अखंडता के सूत्र में बांधता है। जो लोग भी हिंदू राष्ट्र का सपना देख रहे हैं उन्हें यह पता है कि उनके मार्ग में संविधान ही सबसे बड़ी बाधा है। वे सिर्फ महात्मा गांधी को अपशब्द नहीं कह रहे हैं साथ ही मनु स्मृति को अपना आदर्श मानते हैं । इस देश में दो विषयों की अनदेखी के कारण बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है उसमें से पहला विषय है दर्शनशास्त्र और दूसरा है मानवशास्त्र जिसे सामान्य तौर पर एंथ्रोपोलॉजी के नाम से जाना जाता है । जैसे-जैसे बाजारवाद विकृत रूप में प्रभावी होता गया इन दो विषयों का पढ़ना पढ़ाना न्यून होता गया। 1 दिसंबर 1949 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आर एस एस की एक बड़ी सभा हुई यह 2 दिन चली पहले दिन वक्ताओं ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उस समय के कानून मंत्री बीआर अंबेडकर की खूब आलोचना की उन्हें तर्क वितर्क के आधार पर खरी खोटी सुनाई और दूसरे दिन दोनों का पुतला फूंका असल में सनातन धर्मी अपनी सुविधा अनुसार दलितों को अपने साथ कर लेते हैं या काम निकल जाने पर उनकी ओर उपेक्षा का भाव रखते हैं। जिन्होंने आस्तिक नास्तिक वेद के मानने वाले न मानने वाले के विषय में जरा भी अध्ययन किया है वे यह जानते हैं की हमारे यहां आस्तिक का अर्थ वेद को मानना और नास्तिक का अर्थ वेद को न मानना है। आस्तिक नास्तिक का अर्थ ईश्वर को मानने न मानने से नहीं है इस तरह वेद को न मानने वाले 3 संप्रदाय भारत में हैं जैन, बौद्ध, चार्वाक इनमें से सबसे ज्यादा विस्तार बौद्ध धर्म का हुआ इसलिए सनातन धर्म के प्रमुख निशाने पर यही होते हैं। बौद्ध धर्म से तार्किक रूप से संवाद करना सनातन धर्मयों को कठिन लगता था क्योंकि बौद्ध विचारधारा ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया था। नालंदा और तक्षशिला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। व्यवहारिक मामलों में जब बौद्ध धर्म पर पार पाना संभव नहीं हुआ तो उन्हें शंकराचार्य ने दार्शनिक पक्षों के साथ तर्क में घेरा तभी तो 9 वीं सदी में अदवैतवाद का प्रभाव बड़ा शंकराचार्य का एक सूत्र वाक्य ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या जीवो ब्रह्म नापरा के कारण किसी व्यक्ति को मोक्ष भले मिल गया हो समाज का बड़ा नुकसान हुआ साथ ही कर्म फल का सिद्धांत और उससे जुड़ा हुआ पुनर्जन्म ने व्यक्तियों को जैसा है उसे स्वीकार करना सिखा दिया और यहीं से समाज की प्रगति रुक गई क्योंकि यदि हम अपने वर्तमान में जैसे हैं उसके लिए हमारा पूर्व जन्म ही उत्तरदाई है तो सुधार की गुंजाइश भी खत्म हो जाती है और यही जातिवाद को पोसता है इस समय कालीचरण जैसे लोग जिस तरह के कुतर्कों के आधार पर सिद्धांत पेश कर रहे हैं उससे समाज का कोई भला नहीं होने वाला और जरूरी है कि ऐसे लोगों से एक तरफ सख्ती से निपटा जाए साथ ही हम व्हाट्सएप के अध कचरे ज्ञान से अज्ञान से निपटने के लिए रास्ता खोजें और कम से कम देश के उन 110000 स्कूलों में तत्काल शिक्षकों की भर्ती करें जिनमें इस समय एक एक शिक्षक ही हैं।