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24hnbc उमेश राजपूत हत्याकांड से भी सीबीआई हुई है दागदार 2011 का प्रकरण आज तक है अनसुलझा
Sunday, 19 Dec 2021 00:00 am
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समाचार - बिलासपुर
 
बिलासपुर। गरियाबंद ग्राम छूरा के फिगेश्वर रोड के आमापारा क्षेत्र को 23 जनवरी 2011 के पूर्व सीबीआई में पीएमओ में शायद ही कोई जानता रहा हो यहां हुए उमेश राजपूत पत्रकार के मर्डर केस के बाद अभी भी 2021 तक सीबीआई के डीएसपी एनपी मिश्रा नमो प्रसाद मिश्रा के पत्राचार के कारण व्हीआईपी हलकों में चिंता की लकीरें हैं । एनपी मिश्रा ने 1-2 नहीं 3 आईपीएस जो कि सीबीआई में ही कार्यरत है पर गंभीर आरोप लगाए मिश्रा जी 1-2 नहीं 100 पत्र लिख चुके हैं यदि उनके पत्रों में कोई सच्चाई नहीं होती तो अभी तक उन्हें निलंबित किया जा चुका होता मिश्रा जी के पत्राचार पर बाद में चर्चा करेंगे अभी हम यह समझे कि उमेश राजपूत पत्रकार गरियाबंद हत्या दिनांक 23 जनवरी 2011 छत्तीसगढ़ की कानून व्यवस्था सत्ता और अपराधियों के संबंध के साथ महत्वपूर्ण क्यों है।19 दिसंबर 2010 के दिन जाने आज का ही दिन बिलासपुर में दैनिक भास्कर के पत्रकार सुशील पाठक की हत्या हुई और 1 महीने से कुछ ज्यादा दिन पर 23 जनवरी 2011 को उमेश राजपूत का उन्हीं के घर के सामने 6:30 बजे शाम को गोली मारकर मर्डर कर दिया गया । जनवरी का महीना 6:30 बजे इतना अंधेरा नहीं होता कि एक पत्रकार को घंटी बजा कर घर से बाहर बुलाया जाए गोली मार दी जाए हत्यारे मोहल्ला, शहर छोड़कर फरार हो जाएं और सीबीआई जांच में भी कोई पकड़ा न जाए शुरुआत में स्थानीय पुलिस ने सविता नाम की एक महिला को हिरासत में लिया था सूत्र बताते हैं कि हत्या के कुछ ही दिन पहले उमेश राजपूत का अस्पताल वालों से भी विवाद हुआ था उसे खनिज माफिया से भी धमकी मिल रही थी तब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने भरोसा दिलाया था कि शीघ्र ही हत्यारे पकड़े जाएंगे और दोषियों को दंड मिलेगा। स्थानीय पुलिस ने 1-2 नहीं 11 लोगों का ब्रेन मैपिंग टेस्ट अदालत के आदेश से कराया किंतु कार्यवाही कुछ हो नहीं रही थी परेशान होकर मृतक के भाई ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का रुख किया उन्होंने नागरिक अधिकारों के लिए हमेशा लड़ने वाली एडवोकेट सुधा भारद्वाज के माध्यम से याचिका लगाई जिस पर 18 दिसंबर 2014 को जस्टिस एमएम श्रीवास्तव ने सीबीआई जांच का आदेश दिया। लोगों को उम्मीद जगी कि अब जब मामला सीबीआई के पास पहुंच गया है तो हत्यारे पकड़े ही जाएंगे 2014 में सीबीआई ने जांच प्रारंभ की और 23 सितंबर 2017 के दिन सीबीआई जांच पर ही मृतक की मां ने सवाल उठा दिए असल में हुआ यह था कि सीबीआई ने शिव वैष्णव नाम के एक पत्रकार को ही हिरासत में लिया था और 23 सितंबर 2016 के दिन हिरासत में ही शिव वैष्णव ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी पूरा मामला आश्चर्यजनक रूप से उलझ गया जिन पर जांच की जिम्मेदारी थी उन्हें ही प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया गया। जांच टीम का नेतृत्व डीएसपी एनपी मिश्रा ही कर रहे थे इस दौरान दो अहम गवाह राजू पांडे और एक अन्य की असमय मृत्यु भी हो चुकी है इस तरह सीबीआई हिरासत में एक व्यक्ति की मौत ने सब कुछ उलझा दिया मृतक के परिजनों का कहना था कि सबसे पहले पुलिस ने घटनास्थल से जप्त समान गायब कराया और जांच अधिकारी का कहना था कि बिलासपुर के एक बिल्डर का नाम हत्याकांड में आ रहा है पर उससे पूछताछ की परमिशन नहीं मिलती अभी कुछ दिन पूर्व ही गरियाबंद थाने के पूर्व टी आई के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी हुआ तब भी ऐसा लगा कि तब नहीं तो अब मामले का खुलासा होगा पर नहीं हुआ । 
अगली रिपोर्ट में हम एनपी मिश्रा की चिट्ठी के आधार पर यह बताएंगे कि उनकी नजरों में उमेश राजपूत और सुशील पाठक के हत्याकांड किस तरह जुड़े हुए हैं यह पत्र दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी अखबार पायोनियर में बड़ी सुर्खियों के साथ छपा था साथ ही हम उन दर्जनभर लोगों का जिक्र भी करेंगे जिनकी जांच होना चाहिए क्योंकि उन्होंने चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे में हो कर भी अपराधियों के लिए फर्जी बीमारी सर्टिफिकेट बनाएं।