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24hnbc उनसे जिनसे होती है इंसान को तकलीफ वह समझते हैं कि वे हमेशा अक्ल वाले हैं
Sunday, 28 Nov 2021 18:00 pm
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। भारतीय पुलिस के पास बहुत लंबे समय 303 जिसे 3 नॉट 3 के नाम से जाना जाता था। मारका बंदूक होती थी जाने इस बंदूक से कितने एनकाउंटर हुए होंगे इन दिनों संसद में सत्ताधारी दल का यही आंकड़ा है बाहर जो मदर संगठन बैठा है वह उसके मानने वाले लोगों की थाली से लेकर बेडरूम तक और बेडरूम से लेकर बैठक कब तक यह तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि लोग कैसे चले लोग और लोक एक ही है देश संविधान से चलता है और हमारी प्रस्तावना में ही यह लिखा है कि हम धर्मनिरपेक्षता लोक कल्याणकारी देश हैं। अब यह संगठन भारत को हिंदू राष्ट्र के रुप में देखना चाहता है। आवाम जाग जाए यह मनुवाद थोड़े बदले हुए स्वरूप में हैं आखिर इनका डीएनए तो मनु स्मृति ही हैं। देश में वर्ग हो अच्छी बात है किंतु वर्ण व्यवस्था ने जितना नुकसान भारत का किया किसी और व्यवस्था ने नहीं किया और वर्णवाद को मानने वाले ही फिर से नए तरीके का मनुवाद ला रहे हैं अचानक सबको मंदिरों की जरूरत पड़ गई है, ईश्वर की बनाई दुनिया इतनी खूबसूरत है कि ईश्वर को खोजने के लिए किसी मंदिर या यूं कहें किसी भी उपासना स्थल की जरूरत नहीं खासकर ऐसा उपासना स्थल जहां व्यक्ति व्यक्ति के बीच में विभेद किया जाता हो कौन कहां अपने तरीके से उपासना करेगा। खुले में करेगा, बंद दीवारों के बीच करेगा, छत के नीचे करेगा, छत के ऊपर करेगा, गुंबद के नीचे करेगा या जल के ऊपर नाव पर करेगा, पद्मासन में करेगा, सुख आसन में करेगा, खड़े होकर करेगा या बैठकर करेगा यह व्यक्ति को स्वयं तय कर लेने दे क्या खाकर करेगा, क्या त्याग कर करेगा यह भी व्यक्तिगत मामला है ज्ञान किसे प्राप्त होगा मुद्रा यह तय नहीं करती जब आत्मा बोध होना होता है तब साधक ने क्या पहना है यह मायने नहीं रखता किंतु जिन्हें ज्ञान होने का दंभ है वे पोशाक से यह तय कराने लगते हैं कि उन्हें ज्ञान प्राप्त है। धर्म इतना खूबसूरत शब्द है किंतु आदमी ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इस शब्द की आड़ में इतनी हिंसा की जितनी हिंसा विश्व युद्ध में भी नहीं हुई। महाभारत के युद्ध में ही जिसे धर्म युद्ध कहा जाता है में जनहानि के आंकड़े इस बात को सिद्ध करते हैं आज हमारे बीच फिर से धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक राज्य बनने की बात आ रही है जिस मार्ग पर हम 70 वर्ष से चल रहे हैं और हमारे संविधान में वह ताकत है कि राष्ट्रभक्ति संवैधानिक राष्ट्रवाद के साथ ही सर्वोत्तम तरीके से की जा सकती है तब इस पथ को छोड़ने का विचार ही क्यों होना चाहिए।