24hnbc दुहाई है दुहाई लोक में कील ठोक रहा तंत्र, पीएम दे रहे दुहाई
Friday, 26 Nov 2021 18:00 pm
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। शुक्र है कि संविधान दिवस के दिन ही देश में चल रहे किसान आंदोलन को 1 साल पूरा हुआ और आवाम को बहुत कुछ सोचने का मौका मिला धन्यवाद एक व्यक्तिवाद के प्रनेता पीएम को जिन्होंने लोकतंत्र की दुहाई दी जैसे ही उन्होंने यह वाक्य कहा बहुत दिन के बाद उन्मुक्त होकर ठहाका मारने का जी चाहा जिस आंदोलन में 700 से ज्यादा किसान शहीद हो गया। सत्ता ने जी भरकर तंत्र को किले दी और कहा कि ठोक बेटा ठोक लोक में तो क्योंकि तंत्र बचाना है कारण सत्ता लोक में नहीं ।
संविधान दिवस के दिन देश के सभी गणमान्य एक स्थान पर जूटे और गणमान्य के मुखिया ने परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए घातक बताया यह कहते हुए वह अपनी पार्टी के अपने मातृ संगठन के परिवारवाद को एक विशेष परिवारवाद से पृथक मानते हैं । इसे स्पष्ट शब्दों में कहा जाता है कि मेरा "पैर चरण और दूसरे का पैर खूर" देश के लोक ने इसी माह अपने सीजेआई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का एक व्याख्यान भी सुना है और यह व्याख्यान आंध्र प्रदेश के एक शिक्षा संस्थान में दिया गया उन्होंने कहा कि शासक को रोज अपने द्वारा लिए गए निर्णयों की समीक्षा करना चाहिए उन्होंने रामायण और महाभारत के उदाहरण भी दिया भारत में सीजेआई का एक ही पद है और जब एक पद पर बैठा व्यक्ति कोई संदेश देता हैं तो वह संबोधित तो आवाम को कर रहा पर इशारा उसका किस ओर है इसे समझने के लिए बहुत ज्यादा तपस्या की जरूरत नहीं सहज ज्ञान से ही समझ आता है कि उन्होंने शासक शब्द किसके लिए इस्तेमाल किया । भारत में इस वक्त किसानों की 14 करोड़ 85 लाख है और इसमें मजदूरों की संख्या और जोड़ लें तो यह आंकड़ा 30 करोड़ के लगभग हो जाता है देश में खातों की संख्या 13 करोड़ 85 लाख के लगभग है यह आंकड़ा नाबार्ड का है इनमें से छोटा किसान जिसके पास 2 एकड़ से कम भूमि है उसमें से 83% बीपीएल है 4 एकड़ वाले किसान में 90% बीपीएल है मध्यम दर्जे वाले 84% और ऊंचे किसान जिनके पास 10 एकड़ से अधिक जमीन हैं इनमें से 82% कर्जदार हैं हमारे देश के विश्वविद्यालयों में जो अर्थशास्त्र की किताबें पढ़ाई जाती थी उनमें से एक पाठ्यक्रम भारतीय अर्थशास्त्र भी था जिसमें कृषि पर काफी जोर दिया गया था और किसान की परिभाषा आज भी याद है भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है कर्ज में जीता है और कर्ज में ही मर जाता है यह परिभाषा 1992-93 के पाठ्यक्रमों में खूब पढ़ाई जाती थी उस समय इस अध्याय का उद्देश्य यह बताना था कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण क्यों किया गया आज किसान की हालत और भी ज्यादा खराब है सत्ता जिस लोक तंत्र के लिए दुहाई दुहाई बोल रहा है वही सत्ता देश में पैदा होने वाले कुल उपज का मात्र 42% एमएसपी पर खरीदता है देश में कुल किसानों की संख्या 14 करोड़ 85 लाख है जिसमें से सरकार मात्र 1 करोड़ 25 लाख किसानों का उपज ही खरीदता है कोविड काल में जब उद्योग वाणिज्य यहां तक की सर्विस सेक्टर में नकारात्मक आंकड़े से बड़ी संख्या में मजदूर नंगे पांव अपने घर वापसी कर रहे थे तब कृषि क्षेत्र ने ही इन्हें छतरी दी और जिस योजना ने इन्हें सांसे भी उस योजना का नाम मनरेगा है जिसे माननीयों के सभा में शासक ने कई बार गंदगी का टोकरा कहा है और यह भी कहा कि इसे वे इसलिए जिंदा रखेंगे क्योंकि इस योजना से वे एक परिवार को लक्षित कर कर तीर चलाते हैं । पिछले 7 सालों में सत्ता ने देश के मात्र 3% लोगों को बैंकों की जमा उपलब्ध कराई है देश की कुल जनसंख्या का 3% भी उद्योगपति नहीं है जिनके लिए बैंक के दरवाजे 24 घंटे खुले हैं । संविधान दिवस पर लोक को बचाने के स्थान पर तंत्र को सत्ता अपने लिए बचाना चाहती है जिसका अर्थ यह है कि जब लोक सत्ता पर दबाव डालें तंत्र सत्ता की ढ़ाल बने आवाम को शासक का वह नाटक याद होगा जब गणमान्य के भवन के बाहर प्रवेश के पूर्व कैसे चौखट को माथा रखकर नमन किया था मंदिर बताया था और उस मंदिर में बैठकर 20 सितंबर 2020 को कैसे लोक को निपटाने के लिए कानून बनाएं तभी से देश का लोक सड़क का पर है और सत्ता को चुनौती दे रहा है। शासक स्वयं को तपस्या अधीन बताता है कहता है कि उसकी तपस्या में कोई कमी रह गई ऐसे विकट परिस्थिति में आया संविधान दिवस एक बार आवाम को मौका दे रहा है की लोक तय करें की सत्ता लोक तंत्र से बनकर संविधान अनुसार चलेगी या शासक तंत्र को अपने अनुसार चलाएगा।