24hnbc राज्य में सुरक्षाबलों के 68 हजार जवान, समाप्त नहीं होता नक्सलवाद
Sunday, 14 Nov 2021 18:00 pm
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर । 25 मई 2013 झीरम घाटी में नक्सलियों ने जो तांडव मचाया वह देश के इतिहास में किसी राजनैतिक दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हुआ सबसे बड़ा हमला था। राज्य की सत्ता पर भारतीय जनता पार्टी का अधिकार था और कांग्रेस विपक्ष में थी नेता सुरक्षा बल के जवान कुल मिलाकर 31 लोग शहीद हुए थे। हाल ही में इस हमले की जांच कर रहा न्यायिक आयोग की रिपोर्ट आ गई है उस पर भी विवाद है। छत्तीसगढ़ से लगे हुए महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और झारखंड के नक्सली मूवमेंट पर सुरक्षाबलों को दो बड़ी सफलता हाथ लगी है। महाराष्ट्र में सी 60 यूनिट ने एमएमसी के कमांडर मिलिंद तलवूडे को एक मुठभेड़ में मार गिराया, 25 और भी नक्सली मारे गए। मिलिंद पर 50 लाख का इनाम था ध्यान देने वाली बात यह है कि मिलिंद नक्सलवाद का दलित चेहरा था। जिसके मायने आगे नजर आएंगे इसी तरह झारखंड में प्रशांत बोस को सुरक्षाबलों ने गिरफ्तार किया है इस नक्सली नेता पर एक करोड़ का इनाम घोषित था। एमएमसी का गठन हाल ही में हुआ है यह यूनिट महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिलों को लेकर माओवादियों ने बनाई है। छत्तीसगढ़ में 2011 से 2020 तक 10 सालों में 3722 नक्सली घटनाएं हुई । जिसमें 736 आम आदमी, 489 जवान, 656 नक्सली मारे गए। एक लिखित प्रश्न के जवाब में लोकसभा में बताया गया कि 2011 में 465 नक्सली घटनाएं 2012 में 370 नक्सली घटनाएं मरने वालों की संख्या 46, 2013 में 355 नक्सली घटना मृत्यु 44, 2014 में 328 नक्सली घटना मरने वालों की संख्या 60, 2015 में 466 नक्सली घटनाएं मरने वालों की संख्या 48, 2016 में 395 घटनाएं मरने वालों की संख्या 38, 2017 में 373 नक्सली घटनाएं मरने वालों की संख्या 60, 2018 में 392 घटनाएं और मरने वालों की संख्या 55, 2019 में नक्सली हमलों की संख्या 263 मरने वालों की संख्या 22, 2020 में नक्सली हमलों की संख्या 315 मरने वालों की संख्या 36 इस तरह कुल 3722 नक्सली घटनाओं में 736 आम आदमी, 489 जवान और 656 नक्सली मारे गए। छत्तीसगढ़ के 8 जिले नक्सल प्रभावित हैं जबकि छत्तीसगढ़ से ज्यादा नक्सल प्रभावित जिले झारखंड में हैं। और इसी 10 साल के भीतर 13 नक्सल प्रभावित जिलों में 3256 नक्सली हमले हुए इस तरह देखा जाए तो झारखंड में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या छत्तीसगढ़ से ज्यादा है वहां पर 13 जिले नक्सल प्रभावित हैं किंतु नक्सल हमलों की संख्या छत्तीसगढ़ से कम है सरकार नक्सली हमलों को वामपंथी उग्रवादी हमले बताती है। छत्तीसगढ़ को 10 सालों में नक्सल नियंत्रण के लिए कई करोड़ मिले हैं 2017 -18 में 92 करोड़ तथा 2020-21 में 140 करोड़ रुपए नक्सल क्षेत्रों पर कानून व्यवस्था के नाम पर खर्च के लिए मिला। 2017 में छत्तीसगढ़ में 28 बटालियन डिप्लॉयड की गई 10 बटालियन बस्तर में ही थी एक बटालियन में 1000 कर्मी होते हैं 2020 में 5 और बटालियन दी गई इस तरह इस समय छत्तीसगढ़ में 33 बटालियन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों पर तैनात हैं। राज्य में 78 हजार सुरक्षा सैनिक तैनात हैं। जिसमें सीआरपीएफ के 32000, आईटीबीपी के 8000, बीएसएफ के 8000, छत्तीसगढ़ आर्म फोर्स के 20000 सुरक्षा जवान तैनात है। घूम फिर कर यह प्रश्न फिर उठता है कि 92 करोड़ 140 करोड़ जैसी भारी भरकम रकम मिलने के बाद भी कुछ सौ नक्सलियों पर 68 हजार सुरक्षाकर्मी नियंत्रण क्यों नहीं कर पाते। नक्सलवाद पर जिला से लेकर राजधानी रायपुर तक और रायपुर से दिल्ली तक साथ ही कई बार यूनिफाइड कमांड की बैठके होती है पर सफलता दूर ही रहती है इसी तरह 2013 में जो यूनिफाइड कमांड फोर्स बनी थी वह उस समय के छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के नेतृत्व में काम कर रही थी। झीरम के हमले के बाद ना तो छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ने इस्तीफा दिया, ना ही झीरम कांड के पीछे डॉ रमन सिंह की भूमिका की जांच हुई। आखिर यूनिफाइड कमांड का नियंत्रण उन्हीं के हाथ में था। तो डॉक्टर साहब का कहीं ना कहीं नैतिक उत्तरदायित्व तो बनता ही है। समय-समय पर राज्य एवं केंद्र सरकार इन मामलों की गहन छानबीन करता है की नक्सली घटनाओं को बढ़ावा देने में लगे लोगों के पास भारी भरकम धनराशि कहां से आती और जाती है जब कभी भी इन मामलों में जांच होती है तो छूटभैये ही फसते हैं जबकि छत्तीसगढ़ के कुछ जनप्रतिनिधियों के खाते विदेश में होने के भी समाचार छपते रहते हैं क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से इन खातो की जांच नहीं होनी चाहिए 2014 में जब नोटबंदी की गई तब नोटबंदी के विभिन्न कारणों में एक बड़ा कारण नक्सलियों के पास उपलब्ध धनराशि को 0 कर देना भी था । 2014 के बाद ऐसा कभी नहीं लगा कि नक्सली नेता या उनके कार्यकर्ता नगदी की समस्या से जूझ रहे हो तब यह क्यों ना माना जाए कि नक्सली नेताओं का शहरी नेटवर्क जबरदस्त है जिस पर राज्यों की खुफिया एजेंसियों की सूचनाएं या तो ब्लॉक हैं अथवा एजेंसी उस पर काम नहीं करते।