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24hnbc इतिहास लोकतंत्र के तटस्थ नागरिक को माफ नहीं करेगा
Friday, 13 Aug 2021 18:00 pm
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समाचार -
बिलासपुर। 15 अगस्त 2021 को हम अपने देश भारत का 75 वां स्वाधीनता दिवस मनाएंगे हम सबको स्वाधीनता दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं खुश होते समय हमको कुछ कड़वे प्रश्न भी मस्तिष्क में कौधं दे रहे हैं जिन पर विचार करना और उत्तर खोजना जरूरी हो गया है । 15 अगस्त 1947 को जब हम अथवा हमारे दादा दादी ने स्वतंत्रता का स्वाद चखा तब उन्होंने देश पर शासन के लिए जिस पद्धति को चुना उसे हम लोकतंत्र कहते हैं। निश्चित रूप से लोकतंत्र विश्व के भीतर विभिन्न शासन पद्धतियों में श्रेष्ठ है भले ही इसकी कुछ कमियां है। जिस वक्त लोकतंत्र को शासन पद्धति के रूप में चुना गया तब यह भी विचार था कि लोकतंत्र धीरे धीरे गुण तंत्र में विकसित होगा और आने वाली पीढ़ियां इस तंत्र को बेहतर तरीके से सवारेगी, संभालेगी हमारे देश को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और बताया जाता है कि भारत गांव में बसता है इसलिए आज 75 वां वर्षगांठ पर हम लोकतंत्र को कृषि की भाषा में ही समझते हैं जब इस खेत में लोकतंत्र को गुण तंत्र बनाने के लिए जिस बीज को डाला गया था वह बीज प्रस्फुटित नहीं हुए या हुए भी तो उनकी संख्या बेहद कम थी निश्चित रूप से खेत तैयार नहीं थे और जिन लोगों को लोक अपने जनप्रतिनिधि बनाकर विभिन्न सदनों में भेजा उनमें ग्राफ्टिंग की कला भी विकसित नहीं हुई यदि हमने यह समझ लिया होता कि बीज से पेड़ नहीं बन रहा है तो पेड़ से और पेड़ बना लेते हैं किंतु यह भी नहीं हुआ अब खेती की जमीन खाली तो थी बीज की जगह पर खरपतवार आ गई और जैसा खेती में होता है फसल कम से कम हो गई खरपतवार तेजी से बढ़ती गई और यही कारण है कि आज सदन तो चलता है किंतु कृषि प्रधान देश का किसान सदन के बाहर अपना समानांतर सदन चलाने को बाध्य है । मात्र 75 साल में किसान इस तरह हशिए पर आया कि सदन के थोड़ी ही दूर पर उसे अपनी बात कहने के लिए एक और सदन बनाना पड़ा । लोकतंत्र के दोनों पक्ष सत्ता या विपक्ष अपने अपने तरीके से लगातार कमजोर हो रहे हैं जनता को नोटा मिला तो लोगों ने उसे क्रांतिकारी निर्णय बताया तब भी चूक हमारी ही थी निम्न में से कोई नहीं किंतु उसी निम्न में से कोई नहीं कोई तो चुनकर जाएगा और धीरे-धीरे इसी तरह के माननीय की भीड़ एकत्र होती जाएगी इन सब का अर्थ यही है कि लोकतंत्र के मैदान में जब खरपतवार बढ़ती जा रही है और कीटनाशक छिड़कने का कोई लाभ नजर नहीं आता तो लोक को दो हाथ प्राप्त है केवल ईवीएम पर बटन दबाने से खरपतवार नष्ट नहीं होगा अब तो दोनों हाथों से तंत्र के मैदान में उतर कर खरपतवार को जड़ से उखाड़ कर एकत्र कर एक बार समूल नष्ट करना होगा तभी हमारे पूर्वजों ने जिस गुण तंत्र की कल्पना की थी वह साकार हो अन्यथा लोक तंत्र गुण तंत्र के स्थान पर तेजी से अवगुण तंत्र या दुर्गुण तंत्र कहे में तब्दील हो रहा है और वक्त उनका भी इतिहास लिखेगा जो इन सब संकटों में तटस्थ बने रहें।