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जो हारेगा वहां होगी कलह
Friday, 26 Mar 2021 18:00 pm
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यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि इस बार पांच राज्यों का चुनाव पार्टियों की आंतरिक राजनीति के लिए भी बहुत निर्णायक होगा। भाजपा में चाहे एक व्यक्ति का कितना भी मजबूत नेतृत्व है लेकिन अगर पांच राज्यों में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो कलह होगी। कांग्रेस में तो खैर बड़ी कलह मचेगी। तृणमूल कांग्रेस में चुनाव से पहले जो भगदड़ मची थी वह और तेज हो जाएगी तो तमिलनाडु में अन्ना डीएमके कम से कम दो हिस्सों में बंट जाएगा। चुनाव हारने के बाद पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम एक साथ नहीं रह सकते हैं। लेफ्ट पार्टियों की राजनीति भी बुरी तरह से प्रभावित होगी और मौजूदा महासचिव सीताराम येचुरी को बड़ी चुनौती मिलेगी।सबसे ज्यादा खतरे वाली बात कांग्रेस के लिए है। अगर पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं होता है तो कांग्रेस में बिखराव होगा और अगर पार्टी एक बार फिर टूट जाए तो हैरानी नहीं होगी। वैसे भी चुनाव से पहले ही कांग्रेस के अनेक नेता तेवर दिखा रहे हैं और उनको भाजपा का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन भी है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी अध्यक्ष का चुनाव इस उम्मीद में मई-जून तक टलवाया था पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा होगा तो राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाने में कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन अगर नतीजे ठीक नहीं हुए तो राहुल के लिए रास्ता मुश्किल होगा। कांग्रेस के नतीजे ठीक होने का मतलब है कि वह केरल में अपने नेतृत्व में और और तमिलनाडु में डीएमके के साथ मिल कर सत्ता में आ जाए। इसके अलावा असम और बंगाल में अपनी सीटें बचाने में कामयाब हो जाए। इसमें मुश्किल यह है कि असम में तो कांग्रेस अपनी सीटें बचाती दिख रही है और तमिलनाडु में डीएमके के साथ सरकार में आने की भी पूरी उम्मीद है। पर पश्चिम बंगाल में पिछली बार जीती 44 सीटों में से ज्यादातर का उसे नुकसान हो सकता है। उधर केरल में तमाम चुनाव पूर्व सर्वेक्षण लगातार दूसरी बार लेफ्ट मोर्चे के जीतने की उम्मीद जता रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए बड़ा झटका होगा। फिर कांग्रेस की अंदरूनी कलह संभालने में बड़ी मुश्किल होगी।असर होगा। अगर अन्ना डीएमके हार जाती है, जिसकी संभावना हर सर्वेक्षण में जताई जा रही है तो पार्टी टूटेगी। मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी और उप मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम दोनों अलग अलग रास्ता पकड़ेंगे। दोनों सत्ता की गोंद से ही चिपके हुए हैं। फिर वीके शशिकला और टीटीवी दिनाकरण के लिए अवसर बन सकता है। संभव है कि पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम दोनों शशिकला की शरण में जाएं। पिछले दिनों खबर आई थी कि अन्ना डीएमके एक बार फिर शशिकला को पार्टी में लेने पर विचार कर रहा है। वैसे उन्होंने सार्वजनिक जीवन से संन्यास का ऐलान किया है पर उन्हें चुनाव बाद सक्रिय राजनीति में लौटने में दिक्कत नहीं होगी।अगर वामपंथी पार्टियों का मोर्चा केरल में चुनाव नहीं जीतता है तो यह उनकी ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। यह तो तय है कि बंगाल में लेफ्ट का तंबू पूरी तरह से उखड़ा हुआ है और इस बार भी उसे कुछ हासिल नहीं होने वाला है। त्रिपुरा में भी लेफ्ट पहले से हार कर बाहर हो गया है। उसकी एकमात्र उम्मीद केरल से है। अगर लेफ्ट मोर्चा केरल की सत्ता में वापसी करता है तो देश में वामपंथी राजनीति की सांस चलती रहेगी। फिर तीसरे मोर्चे की राजनीति भी तेज हो सकती है