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चित्रगुप्त के छद्म नाम से अपनी बायोग्राफी लिखी थी सावरकर ने

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समाचार  :-
बिलासपुर, 22 सितंबर 2022 । देश भक्त और कट्टर राष्ट्रभक्त के बीच क्या अंतर होता है इसे एक उदाहरण से समझें यह उदाहरण बिलासपुर शहर और सुदूर अंडमान निकोबार के बीच का है कारण आगे जाकर स्पष्ट करेंगे। पूरे देश के साथ बिलासपुर में भी अंग्रेजों को भारत से बाहर करने के लिए आंदोलन चल रहा था तब शहर में कांग्रेस ने एक राजनैतिक आंदोलन रखा जिसमें हिंदी के प्रसिद्ध कवि पंत ने भी हिस्सा लिया भाषण दिया, परिणाम स्वरूप जेल हुई। और बिलासपुर के केंद्रीय कारागार में उन्हें रखा गया एक दिन की बात है जेलर ने उन से मुलाकात की और दो चीजें उन्हें दी एक था पेन और कागज और दूसरी थी रस्सी। बताते हैं श्री पंत ने रस्सी ले ली और कॉपी तथा पेन से लिखे जाने वाला माफीनामा कबूल नहीं किया। दूसरी ओर विनायक दामोदर सावरकर के माफीनामा का यह अंश अगर "सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता से मुझे रिहा करती है, मैं यकीन दिलाता हूं कि मैं संविधान वादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादार रहूंगा"। परिणाम सावरकर जेल के बाहर निकल आए। पंत जी तो जेल में ही रहे इस उदाहरण को यहां लिखने का कारण यह है कि आरएसएस संगठन से जुड़े हुए सैकड़ो लोगों ने समय-समय पर माफीनामा लिखकर सरकार की कृपा प्राप्त की है। स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के अतिरिक्त आपातकाल में भी ऐसे कई नाम हैं कुछ लोगों को याद होगा भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता मूलचंद खंडेलवाल ने आपातकाल के समय ना केवल लिखकर माफी मांगी थी बल्कि दल बदल भी कर लिया था और इस कारनामे का गवाह लाल बहादुर शास्त्री स्कूल का मैदान है जहां पर एक आम सभा में उस वक्त के केंद्रीय मंत्री व्ही सी शुक्ल के सामने स्वर्गीय मूलचंद खंडेलवाल में कांग्रेस प्रवेश किया और बाद में फिर कांग्रेस छोड़ दिया और भाजपा से जीत कर मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने। अब सवाल सावरकर का है यह नाम बार-बार इसलिए आ जाता है कि अभी कुछ ही दिन पूर्व बिलासपुर में श्रीकांत वर्मा सृजन संवाद का आयोजन हुआ जिसमें भोपाल से पधारी रंजना अरगड़े ने वर्मा जी की डायरी के हवाले से यह बताया कि सावरकर राष्ट्रभक्त थे और राष्ट्रभक्त सांप्रदायिक नहीं हो सकता। सावरकर जी वो शख्सियत थे जिन्होंने अपनी बायोग्राफी छद्म नाम चित्रगुप्त के नाम से लिखी। अपने मुंह मियां मिट्ठू सो जमकर अपनी तारीफें की और स्वयं को वीर की उपाधि भी दे दी तो नाम हो गया वीर सावरकर छद्म नाम भी ऐसा रखा चित्रगुप्त सनातन धर्म के जानकार ऐसा बताते हैं कि यमलोक में पाप पुण्य का हिसाब रखने का काम चित्रगुप्त का है और धरती पर कायस्थ उन्हें अपना पूज्य मानते हैं। इस किताब का प्रकाशन भी वीर सावरकर के नाम का था । 1987 में इस किताब का दूसरा एडिशन प्रकाशित हुआ किताब की प्रस्तावना में ही रविंद्र वामन रामदास ने उसी में इस बात का उल्लेख किया है हिंदू, हिंदुत्व सावरकर कतई हिंदू नहीं थे उन्होंने हिंदू धर्म की सात बेटीयां, जातिवाद, रीति रिवाज, पूजा पाठ, वास्तु आदि पर खुलकर अपने विचार व्यक्त किए। इन दिनों गूगल पर सावरकर की दर्जनों फोटो हैं केवल एक ऐसी फोटो है जिसमें सावरकर के माथे पर तिलक लगा दिखाई देता है और इस फोटो फ्रेम को अमित शाह जी श्रद्धा से नमस्ते कर रहे हैं। असल में सावरकर का राष्ट्रवाद एंटी मुस्लिम राष्ट्रवाद है। 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री ने रायटर को एक इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने स्वयं को हिंदू राष्ट्रवादी बताया यह इंटरव्यू 2013 जुलाई में हुआ था। बिलासपुर में इन दिनों सरकारी खर्चे पर जिस तरह के सांस्कृतिक आयोजन हो रहे हैं यह बात समझ नहीं आती की जिस पार्टी का पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरएसएस के विरोध में हिंदू, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद पर गंभीरता से विचार व्यक्त करता है उस सब को एक तरफ रखते हुए ऐसे आयोजन कैसे हो जाते हैं जिनमें हिंदू महासभा से जुड़े हुए विनायक दामोदर सावरकर को राष्ट्रभक्त बताया जाता है बल्कि यह भी कहा जाता है कि राष्ट्रभक्त कभी सांप्रदायिक नहीं हो सकता । आगे बढ़ते हुए एक वक्ता ने तो यहां तक दावा कर दिया कि हिंदी के सशक्त हस्ताक्षर अज्ञेय मैं 1940 से 1960 के मध्य अज्ञेय ने फर्जी साहित्यकारों को प्रश्रय दिया । अज्ञेय को भारतीय पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय गोल्डन रीथ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया और वे दैनिक समाचार पत्र सैनिक के संपादक रहे, ऑल इंडिया रेडियो में सेवाएं भी दी, 43 में सैनिक सेवा में भी रहे, दिनमान के संपादक बने, प्रतीक के संपादक रहे, नवभारत टाइम्स के संपादक रहे इस तरह से अलग अलग क्षेत्रों में पारंगत व्यक्ति को गोरखपुर से आए हुए साहित्यकार ने बिलासपुर की भूमि पर फर्जी कवियों को प्रश्रय देने वाला घोषित कर दिया।